Sunday, March 24, 2013

ज्योतिष में राहु केतु का महत्त्व:क्या आप बार-बार दुर्घटनाग्रस्त होते हैं? What you again and again crashes? Learn Astrology - Rahu and Ketu

ज्योतिष उपाय: राहु, केतु एवं कालसर्प योग
ग्रहों के अशुभ स्थिति में होने पर उनका उपाय किया जाता है. ग्रहों के उपचार के लिए कई तरीके ज्योतिषशास्त्र में दिये गये हैं जिनके अनुसार राहु, केतु एवं कालसर्प दोष के कुछ विशेष उपाय हैं जिन्हें आप आज़मा सकते हैं.
कमजोर एवं पीड़ित राहु के उपाय (Remedies for Rahu)
राहु भी शनि के समान कष्टदायक ग्रह माना गया है इससे पीड़ित व्यक्ति को भी काफी मुश्किलों का सामना करना होता है. इस ग्रह से पीड़ित व्यक्ति राहु की शांति के लिए जो उपाय कर सकते हैं उनमें दान का विशेष स्थान है. राहु की शांति के लिए लोहे के हथियार, नीला वस्त्र, कम्बल, लोहे की चादर, तिल, सरसों तेल, विद्युत उपकरण, नारियल एवं मूली दान करना चाहिए. सफाई कर्मियों को लाल अनाज देने से भी राहु की शांति होती है. राहु से पीड़ित व्यक्ति को इस ग्रह से सम्बन्धित रत्न का दान करना चाहिए.
राहु से सम्बन्धित अन्य उपाय (Other Remedies for Rahu)
राहु से पीड़ित व्यक्ति को शनिवार का व्रत करना चाहिए इससे राहु ग्रह का दुष्प्रभाव कम होता है. मीठी रोटी कौए को दें और ब्राह्मणों अथवा गरीबों को चावल और मांसहार करायें. राहु की दशा होने पर कुष्ट से पीड़ित व्यक्ति की सहायता करनी चाहिए. गरीब व्यक्ति की कन्या की शादी करनी चाहिए. राहु की दशा से आप पीड़ित हैं तो अपने सिरहाने जौ रखकर सोयें और सुबह उनका दान कर दें इससे राहु की दशा शांत होगी.
राहु की दशा में इन चीज़ों से बचें (Remedies for Rahu Rahu Dasha
मदिरा और तम्बाकू के सेवन से राहु की दशा में विपरीत परिणाम मिलता है अत: इनसे दूरी बनाये रखना चाहिए. आप राहु की दशा से परेशान हैं तो संयुक्त परिवार से अलग होकर अपना जीवन यापन करें.
नीच तथा कमज़ोर केतु के उपाय (Remedies for Ketu)
पौराणिक ग्रंथो में राहु और केतु को एक ही शरीर के दो भाग माना गया है. ज्योतिषशास्त्र इसे अशुभ ग्रह मानता है अत: जिनकी कुण्डली में केतु की दशा चलती है उसे अशुभ परिणाम प्राप्त होते हैं. इसकी दशा होने पर शांति हेतु जो उपाय आप कर सकते हैं उनमें दान का स्थान प्रथम है. ज्योतिषशास्त्र कहता है केतु से पीड़ित व्यक्ति को बकरे का दान करना चाहिए. कम्बल, लोहे के बने हथियार, तिल, भूरे रंग की वस्तु केतु की दशा में दान करने से केतु का दुष्प्रभाव कम होता है. गाय की बछिया, केतु से सम्बन्धित रत्न का दान भी उत्तम होता है. अगर केतु की दशा का फल संतान को भुगतना पड़ रहा है तो मंदिर में कम्बल का दान करना चाहिए.
केतु के अन्य उपाय (Remedies for Ketu Dasha)
केतु की दशा को शांत करने के लिए व्रत भी काफी लाभप्रद होता है. शनिवार एवं मंगलवार के दिन व्रत रखने से केतु की दशा शांत होती है. कुत्ते को आहार दें एवं ब्राह्मणों को भात खिलायें इससे भी केतु की दशा शांत होगी. किसी को अपने मन की बात नहीं बताएं एवं बुजुर्गों एवं संतों की सेवा करें यह केतु की दशा में राहत प्रदान करता है.
काल सर्प दोष के उपाय (Remedies for Ketu Kalsarp Yoga)
काल सर्प दोष राहु और केतु के कारण बनता है. इस दोष से पीड़ित होने पर जीवन में भले ही आप सफलता के आसमान पर पहुंच जाएं परंतु एक दिन यह आपको ज़मीन पर लाकर पटक देता है. इस दोष का उपाय यह है कि आप राहु और केतु के दोष का निवारण करें और महामृत्युंजय मंत्र का जाप करायें. इस दोष में सर्प मंत्र और सर्प सूक्त का पाठ भी लाभप्रद होता है. प्रथम, पंचम और नवम भाव के स्वामी को मजबूत बनाने का उपाय करें.
 ज्योतिष में राहु केतु का महत्त्व   Rahu and Ketu 
  ज्योतिष में राहु केतु का महत्त्व भारतीय वैदिक ज्योतष में राहु को मायावी ग्रह के नाम से भी जाना जाता है तथा मुख्य रूप से राहु मायावी विद्याओं तथा मायावी शक्तियों के ही कारक माने जाते हैं। इसके अतिरिक्त राहु को बिना सोचे समझे मन में आ जाने वाले विचार, बिना सोचे समझे अचानक मुंह से निकल जाने वाली बात, क्षणों में ही भारी लाभ अथवा हानि देने वाले क्षेत्रों जैसे जुआ, लाटरी, घुड़दौड़ पर पैसा लगाना, इंटरनैट तथा इसके माध्यम से होने वाले व्यवसायों तथा ऐसे ही कई अन्य व्यवसायों तथा क्षेत्रों का कारक माना जाता है। नवग्रहों में यह अकेला ही ऐसा ग्रह है जो सबसे कम समय में किसी व्यक्ति को करोड़पति, अरबपति या फिर कंगाल भी बना सकता है तथा इसी लिए इस ग्रह को मायावी ग्रह के नाम से जाना जाता है। अगर आज के युग की बात करें तो इंटरनैट पर कुछ वर्ष पहले साधारण सी दिखने वाली कुछ वैबसाइटें चलाने वाले लोगों को पता भी नहीं था की कुछ ही समय में उन वैबसाइटों के चलते वे करोड़पति अथवा अरबपति बन जाएंगे। किसी लाटरी के माध्यम से अथवा टैलीविज़न पर होने वाले किसी गेम शो के माध्यम से रातों रात कुछ लोगों को धनवान बना देने का काम भी इसी ग्रह का है।
राहु की अन्य कारक वस्तुओं में लाटरी तथा शेयर बाजार जैसे क्षेत्र, वैज्ञानिक तथा विशेष रूप से वे वैज्ञानिक जो अचानक ही अपने किसी नए अविष्कार के माध्यम से दुनिया भर में प्रसिद्ध हो जाते हैं, इंटरनैट से जुड़े हुए व्यवसाय तथा इन्हें करने वाले लोग, साफ्टवेयर क्षेत्र तथा इससे जुड़े लोग, तम्बाकू का व्यापार तथा सेवन, राजनयिक, राजनेता, राजदूत, विमान चालक, विदेशों में जाकर बसने वाले लोग, अजनबी, चोर, कैदी, नशे का व्यापार करने वाले लोग, सफाई कर्मचारी, कंप्यूटर प्रोग्रामर, ठग, धोखेबाज व्यक्ति, पंछी तथा विशेष रूप से कौवा, ससुराल पक्ष के लोग तथा विशेष रूप से ससुर तथा साला, बिजली का काम करने वाले लोग, कूड़ा-कचरा उठाने वाले लोग, एक आंख से ही देख पाने वाले लोग तथा ऐसे ही अन्य कई प्रकार के क्षेत्र तथा लोग आते हैं।
राहु का विशेष प्रभाव जातक को परा शक्तियों का ज्ञाता भी बना सकता है तथा किसी प्रकार का चमत्कारी अथवा जादूगर भी बना सकता है। दुनिया में विभिन्न मंचों पर अपने जादू के करतब दिखा कर लोगों को हैरान कर देने वाले जादूगर आम तौर पर इसी ग्रह के विशेष प्रभाव में होते हैं तथा काला जादू करने वाले लोग भी राहु के विशेष प्रभाव में ही होते हैं। राहु के प्रबल प्रभाव वाले जातक बातचीत अथवा बहस में आम तौर पर बुध के जातकों पर भी भारी पड़ जाते हैं तथा बहस के बीच में ही कुछ ऐसी बातें अथवा नए तथ्य सामने ले आते हैं जिससे इनका पलड़ा एकदम से भारी हो जाता है, हालांकि अधिकतर मामलों में बाद में इन्हें खुद भी आश्चर्य होता है कि ऐन मौके पर इन्हें उपयुक्त बात सूझ कैसे गई। ऐसा आम तौर पर राहु महाराज की माया के कारण होता है कि जातक मौका आने पर ऐसी बातें भी कह देता है जो खुद उसकी अपनी जानकारी में नहीं होतीं तथा अचानक ही उसके मुंह से निकल जातीं हैं।
राहु एक छाया ग्रह हैं तथा मनुष्य के शरीर में राहु वायु तत्व का प्रतिनिधित्व करते हैं। ज्योतिष की गणनाओं के लिए ज्योतिषियों का एक वर्ग इन्हें पुरुष ग्रह मानता है जबकि ज्योतिषियों का एक अन्य वर्ग इन्हें स्त्री ग्रह मानता है। 
राहु एक छाया ग्रह हैं तथा मनुष्य के शरीर में राहु वायु तत्व का प्रतिनिधित्व करते हैं। ज्योतिष की गणनाओं के लिए ज्योतिषियों का एक वर्ग इन्हें पुरुष ग्रह मानता है जबकि ज्योतिषियों का एक अन्य वर्ग इन्हें स्त्री ग्रह मानता है। कुंडली में शुभ राहु का प्रबल प्रभाव कुंडली धारक को विदेशों की सैर करवा सकता है तथा उसे एक या एक से अधिक विदेशी भाषाओं का ज्ञान भी करवा सकता है। कुंडली में राहु के बलहीन होने से अथवा किसी बुरे ग्रह के प्रभाव में होने से जातक को अपने जीवन में कई बार अचानक आने वाली हानियों तथा समस्याओं का सामना करना पड़ सकता है। ऐसे जातक बहुत सा धन कमा लेने के बावजूद भी उसे संचित करने में अथवा उस धन से संपत्ति बना लेने में आम तौर पर सक्षम नहीं हो पाते क्योंकि उनका कमाया धन साथ ही साथ खर्च होता रहता है। राहु पर अशुभ ग्रहों का प्रभाव कुंडली धारक को मानसिक रोगों, अनिद्रा के रोग, बुरे सपने आने की समस्या, त्वचा के रोगों तथा ऐसे ही अन्य कई बिमारियों से पीड़ित कर सकता है।

ज्योतिष में केतु का महत्त्व 

भारतीय वैदिक ज्योतिष में केतु को आध्यात्मिकता से जुड़ा ग्रह माना जाता है तथा इसका प्रबल प्रभाव जातक को आध्यात्मिक क्षेत्र में बहुत बड़ीं उपलब्धियां प्राप्त करवा सकता है। हालांकि कोई जातक गुरू के प्रभाव के कारण भी आध्यात्मिक क्षेत्र में उपलब्धियां प्राप्त कर सकता है किन्तु आध्यात्मिक क्षेत्र में होने के बावजूद भी गुरू तथा केतु के प्रभाव वाले जातकों में सामान्यतया बहुत अंतर होता है। गुरू के प्रभाव वाले जातक आम तौर पर अपनी आध्यात्मिक उन्नति की ओर बढ़ने के साथ-साथ दुनियावी रिश्तों तथा जिम्मेदारियों का पालन करने में भी प्रबल विश्वास रखते हैं जबकि केतु के प्रभाव वाले जातक आम तौर पर आध्यात्म के सामने दुनियादारी तथा रिश्तों-नातों को तुच्छ मानते हैं तथा अपनी दुनियावी जिम्मेदारियां और रिश्ते छोड़ कर केवल आध्यात्म की तरफ ही ध्यान देते हैं। आध्यात्मिक क्षेत्र में उपलब्धियां प्राप्त कर लेने के पश्चात भी गुरू के प्रभाव वाले लोग आम तौर पर जन कल्याण का मार्ग चुनते हैं तथा लोगों के उद्धार के लिए प्रयासरत हो जाते हैं जबकि केतु के प्रभाव वाले जातक आम तौर पर बहुत सारी आध्यात्मिक उपलब्धियां प्राप्त हो जाने के बावजूद भी दुनियादारी से दूर रहकर अपनी आध्यात्मिक उन्नति की ओर ही बढ़ते रहना पसंद करते हैं। इस प्रकार से यह निष्कर्ष निकाला जा सकता है कि केतु के प्रभाव वाले जातक आध्यात्मिक क्षेत्र की ओर दुनियादारी से बुरी तरह मोहभंग हो जाने पर ही जाते हैं जबकि गुरू के प्रभाव वाले जातक दुनियादारी तथा आध्यात्म, दोनों में तालमेल बैठा कर दोनों को एक साथ चलाने में सक्षम होते हैं केतु भी राहु की भांति ही एक छाया ग्रह हैं तथा मनुष्य के शरीर में केतु मुख्य रूप से अग्नि तत्व का प्रतिनिधित्व करते हैं। ज्योतिष की गणनाओं के लिए केतु को ज्योतिषियों का एक वर्ग तटस्थ अथवा नपुंसक ग्रह मानता है जबकि ज्योतिषियों का एक दूसरा वर्ग इन्हें नर ग्रह मानता है। केतु स्वभाव से मंगल की भांति ही एक क्रूर ग्रह हैं तथा मंगल के प्रतिनिधित्व में आने वाले कई क्षेत्रों का प्रतिनिधित्व केतु भी करते हैं। इन क्षेत्रों के अतिरिक्त केतु जिन क्षेत्रों तथा लोगों का प्रतिनिधित्व करते हैं उनमें आध्यात्म तथा आध्यात्मिक रुप से विकसित लोग, परा शक्तियों के क्षेत्र तथा इनकी जानकारी रखने वाले लोग, दवाएं बनाने वाले लोग तथा दवाओं की बिक्री करने वाले लोग, अनुसंधान के क्षेत्र में काम करने वाले लोग, मानवीय इतिहास पर खोज करने वाले लोग, अनाथालय तथा इनके लिए काम करने वाले लोग और संस्थाएं, वृद्ध आश्रम तथा इनके लिए काम करने वाली संस्थाएं, धार्मिक संस्थाएं तथा इनके लिए काम करने वाले लोग, पादरी, जासूस, इतिहासकार, पुरातत्त्ववेत्ता, भूविज्ञानी, गणितज्ञ तथा अन्य कई क्षेत्र, संस्थाएं और व्यक्ति आते हैं। इसके अतिरिक्त केतु नवजात शिशुओं तथा विशेष रूप से नर शिशुओं, कम उम्र के नर बच्चों, चेलों अथवा शिष्यों, कुत्तों, मुकद्दमेबाजी तथा मुकद्दमों, यात्राओं, वृद्ध लोगों, मानसिक रूप से विक्षिप्त लोगों तथा किसी बाहरी बाधा से पीड़ित लोगों के भी कारक माने जाते हैं। कुंडली में केतु के स्थिति विशेष अथवा किसी बुरे ग्रह की दृष्टि के कारण बलहीन होने पर जातक मानसिक रोगों तथा बाहरी बाधाओं से पीड़ित हो सकता है। इसके अतिरिक्त जातक के शरीर का कोई अंग किसी दुर्घटना अथवा लड़ाई में भंग भी हो सकता है तथा जातक को अपने जीवन में कई बार शल्य चिकित्सा करवानी पड़ सकती है जिसके कारण उसके शरीर की बार-बार चीर-फाड़ हो सकती है। कुंडली में केतु पर किसी बुरे ग्रह का विशेष प्रभाव जातक को कानों तथा पैरों के दर्द अथवा इन अंगों से संबंधित बिमारियों, शरीर पर तेज़ धार हथियार से हमला होने जैसी घटनाओं, मानसिक विक्षिप्तता तथा अतयंत मानसिक पीड़ा से भी पीड़ित कर सकता है। केतु पर किसी बुरे ग्रह का विशेष प्रभाव जातक को जीवन भर शहर से शहर और देश से देश भटकने पर बाध्य कर सकता है। ऐसे जातक अपने जीवन में अधिक समय तक एक स्थान पर टिक कर नहीं रह पाते तथा एक स्थान से दूसरे स्थान पर भटकते ही रहते हैं


क्या आप बार-बार दुर्घटनाग्रस्त होते हैं?
दुर्घटना का जिक्र आते ही जिन ग्रहों का सबसे पहले विचार करना चाहिए वे हैं शनि, राहु और मंगल यदि जन्मकुंडली में इनकी स्थिति अशुभ है (6, 8, 12 में) या ये नीच के हों या अशुभ नवांश में हों तो दुर्घटनाओं का सामना होना आम बात है।
शनि : शनि का प्रभाव प्राय: नसों व हड्‍डियों पर रहता है। शनि की खराब स्थिति में नसों में ऑक्सीजन की कमी व ‍हड्‍डियों में कैल्शियम की कमी होती जाती है अत: वाहन-मशीनरी से चोट लगना व चोट लगने पर हड्‍डियों में फ्रैक्चर होना आम बात है। यदि पैरों में बार-बार चोट लगे व हड्‍डी टूटे तो यह शनि की खराब स्थिति को दर्शाता है।
क्या करें : शनि की शांति के उपाय करें। हनुमान चालीसा का पाठ करें। मद्यपान और माँसाहार से पूर्ण परहेज करें। नौकरों-कर्मचारियों से अच्छा व्यवहार करें। शनि न्याय का ग्रह है इसलिए न्याय का रास्ता अपनाएँ, परिवार से विशेषत: स्त्रियों से संबंध मधुर रखें।
राहु : राहु का प्रभाव दिमाग व आँखों पर रहता है। कमर से ऊपरी हिस्से पर ग्रह विशेष प्रभाव रखता है। राहु की प्रतिकूल स्थिति जीवन में आकस्मिकता लाती है। दुर्घटनाएँ, चोट-चपेट अचानक लगती है और इससे मनोविकार, अंधापन, लकवा आदि लगना राहु के लक्षण हैं। पानी, भूत-बाधा, टोना-टोटका आदि राहु के क्षेत्र में हैं।
क्या करें : गणेश जी व सरस्वती की आराधना करें। अवसाद से दूर रहें। सामाजिक संबंध बढ़ाएँ। रिस्क न लें। खुश रहें व बातें न छुपाएँ।
मंगल : मंगल हमारे शरीर में रक्त का प्रतिनिधि है। मंगल की अशुभ स्थिति से बार-बार सिर में चोट लगती है। खेलते-दौड़ते समय गिरना आम बात है और इस‍ स्थि‍ति में छोटी से छोटी चोट से भी रक्त स्राव होता जाता है। रक्त संबंधी बीमारियाँ, मासिक धर्म में अत्यधिक रक्त स्राव भी खराब मंगल के लक्षण हैं। अस्त्र-शस्त्रों से दुर्घटना होना, आक्रमण का शिकार होना इससे होता है।
क्या करें : मंगलवार का व्रत करें, मसूर की दाल का दान करें। उग्रता पर नियंत्रण रखें। मित्रों की संख्‍या बढ़ाएँ। मद्यपान व माँसाहार से परहेज करें। अपनी ऊर्जा को रचनात्मक दिशा दें।
कब-कब होगी परेशानी : जब-जब इन ग्रहों की महादशा, अंतर्दशा या प्रत्यंतर दशा आएगी, तब-तब संबंधित दुर्घटनाओं के योग बनते हैं। इसके अलावा गोचर में इन ग्रहों के अशुभ स्थानों पर जाने पर, स्थान बदलते समय 
भी ऐसे कुयोग बनते हैं अत: इस समय का ध्यान रखकर संबंधित उपाय करना नितांत आवश्यक है।

शनि, राहु और केतु : दोस्त या दुश्मन (तीन ग्रहों की त्रिवेणी, कुछ अच्छी-कुछ बुरी)—-

शनि के अनुचर हैं राहु और केतु। शरीर में इनके स्थान नियु*क्त हैं। सिर राहु है तो केतु धड़। यदि आपके गले सहित ऊपर सिर तक किसी भी प्रकार की गंदगी या खार जमा है तो राहु का प्रकोप आपके ऊपर मँडरा रहा है और यदि फेफड़ें, पेट और पैर में किसी भी प्रकार का विकार है तो आप केतु के शिकार हैं।

राहु और केतु की भूमिका एक पुलिस अधिकारी की तरह है जो न्यायाधीश शनि के आदेश पर कार्य करते हैं। *शनि का रंग नीला, राहु का काला और केतु का सफेद माना जाता है। शनि के देवता भैरवजी हैं, राहु की सरस्वतीजी और केतु के देवता भगवान गणेशजी है।

शनि का पशु भैंसा, राहु का हाथी और काँटेदार जंगली चूहा तथा केतु का कुत्ता, गधा, सुअर और छिपकली है। शनि का वृक्ष कीकर, आँक व खजूर का वृक्ष, राहु का नारियल का पेड़ व कुत्ता घास और केतु का इमली का दरख्त, तिल के पौधे व केला है। शनि शरीर के दृष्टि, बाल, भवें, हड्डी और कनपटी वाले हिस्से पर, राहु सिर और ठोड़ी पर और केतु कान, रीढ़, घुटने, लिंग और जोड़ पर प्रभाव डालता है।

राहु की मार : यदि व्यक्ति अपने शरीर के अंदर किसी भी प्रकार की गंदगी पाले रखता है तो उसके ऊपर काली छाया मंडराने लगती है अर्थात राहु के फेर में व्यक्ति के साथ अचानक होने वाली घटनाएँ बढ़ जाती है। घटना-दुर्घटनाएँ, होनी-अनहोनी और कल्पना-विचार की जगह भय और कुविचार जगह बना लेते हैं।

राहु के फेर में आया व्यक्ति बेईमान या धोखेबाज होगा। राहु ऐसे व्यक्ति की तरक्की रोक देता है। राहु का खराब होना अर्थात् दिमाग की खराबियाँ होंगी, व्यर्थ के दुश्मन पैदा होंगे, सिर में चोट लग सकती है। व्यक्ति मद्यपान या संभोग में ज्यादा रत रह सकता है। राहु के खराब होने से गुरु भी साथ छोड़ देता है।

राहु के अच्छा होने से व्यक्ति में श्रेष्ठ साहित्यकार, दार्शनिक, वैज्ञानिक या फिर रहस्यमय विद्याओं के गुणों का विकास होता है। इसका दूसरा पक्ष यह कि इसके अच्छे होने से राजयोग भी फलित हो सकता है। आमतौर पर पुलिस या प्रशासन में इसके लोग ज्यादा होते हैं।

केतु की मार : जो व्यक्ति जुबान और दिल से गंदा है और रात होते ही जो रंग बदल देता है वह केतु का शिकार बन जाता है। यदि व्यक्ति किसी के साथ धोखा, फरेब, अत्याचार करता है तो केतु उसके पैरों से ऊपर चढ़ने लगता है और ऐसे व्यक्ति के जीवन की सारी गतिविधियाँ रुकने लगती है। नौकरी, धंधा, खाना और पीना सभी बंद होने लगता है। ऐसा व्यक्ति सड़क पर या जेल में सोता है घर पर नहीं। उसकी रात की नींद हराम रहती है, लेकिन दिन में सोकर वह सभी जीवन समर्थक कार्यों से दूर होता जाता है।

केतु के खराब होने से व्यक्ति पेशाब की बीमारी, जोड़ों का दर्द, सन्तान उत्पति में रुकावट और गृहकलह से ग्रस्त रहता है। केतु के अच्छा होने से व्यक्ति पद, प्रतिष्ठा और संतानों का सुख उठाता है और रात की नींद चैन से सोता है।

शनि की मार : पराई स्त्री के साथ रहना, शराब पीना, माँस खाना, झूठ बोलना, धर्म की बुराई करना या मजाक उड़ाना, पिता व पूर्वजों का अपमान करना और ब्याज का धंधा करना प्रमुख रूप से यह सात कार्य शनि को पसंद नहीं। उक्त में से जो व्यक्ति कोई-सा भी कार्य करता है शनि उसके कार्यकाल में उसके जीवन से शांति, सुख और समृद्धि छिन लेता है। व्यक्ति बुराइयों के रास्ते पर चलकर खुद बर्बाद हो जाता है। शनि उस सर्प की तरह है जिसके काटने पर व्यक्ति की मृत्यु तय है।

शनि के अशुभ प्रभाव के कारण मकान या मकान का हिस्सा गिर जाता है या क्षतिग्रस्त हो जाता है, नहीं तो कर्ज या लड़ाई-झगड़े के कारण मकान बिक जाता है। अंगों के बाल तेजी से झड़ जाते हैं। अचानक आग लग सकती है। धन, संपत्ति का किसी भी तरह नाश होता है। समय पूर्व दाँत और आँख की कमजोरी।

शनि की स्थिति यदि शुभ है तो व्यक्ति हर क्षेत्र में प्रगति करता है। उसके जीवन में किसी भी प्रकार का कष्ट नहीं होता। बाल और नाखून मजबूत होते हैं। ऐसा व्यक्ति न्यायप्रीय होता है और समाज में मान-सम्मान खूब रहता हैं।

बचाव का तरीका : शनि के उपाय- सर्वप्रथम भैरवजी के मंदिर जाकर उनसे अपने पापों की क्षमा माँगे। जुआ, सट्टा, शराब, वैश्या से संपर्क, धर्म की बुराई, पिता-पूर्वजों का अपमान और ब्याज आदि कार्यों से दूर रहें। शरीर के सभी छिद्रों को प्रतिदिन अच्छे से साफ रखें। दाँत, बाल और नाखूनों की सफाई रखें।

कौवे को प्रतिदिन रोटी खिलाएँ। छायादान करें, अर्थात कटोरी में थोड़ा-सा सरसो का तेल लेकर अपना चेहरा देखकर शनि मंदिर में रख आएँ। अंधे, अपंगों, सेवकों और सफाईकर्मियों से अच्छा व्यवहार रखें। रात को सिरहाने पानी रखें और उसे सुबह कीकर, आँक या खजूर के वृक्ष पर चढ़ा आएँ।

राहु के उपाय- सिर पर चोटी रख सकते हैं, लेकिन किसी लाल किताब के विशेषज्ञ से पूछकर। भोजन भोजनकक्ष में ही करें। ससुराल पक्ष से अच्छे संबंध रखें। रात को सिरहाने मूली रखें और उसे सुबह किसी मंदिर में दान कर दें।

केतु के उपाय- संतानें केतु हैं। इसलिए संतानों से संबंध अच्छे रखें। भगवान गणेश की आराधना करें। दोरंगी कुत्ते को रोटी खिलाएँ। कान छिदवाएँ। कुत्ता भी पाल सकते हैं, लेकिन किसी लाल किताब के विशेषज्ञ से पूछकर।

राहु और केतु का ज्योतिष में महत्व ज्योतिष में राहु और केतु को छाया ग्रह माना गया है। ये राहु और केतु क्या हैं, और छाया ग्रह से क्या तात्पर्य है? राहु और केतु खगोलीय बिंुद हैं जो चंद्र के पृथ्वी के चारों ओर चक्कर लगाने से बनते हैं। क्योंकि ये केवल गणित के आधार पर बनते हैं, इसलिए काल्पनिक हैं और इनका कोई भौतिक अस्तित्व नहीं है। इसीलिए ये छाया ग्रह कहलाते हैं। छाया ग्रह का अर्थ किसी ग्रह की छाया से नहीं है अपितु ज्योतिष में वे सब बिंदु जिनका भौतिक अस्तित्व नहीं है, लेकिन ज्योतिषीय महत्व है, छाया ग्रह कहलाते हैं जैसे गुलिक, मांदी, यम, काल, मृत्यु, यमघंटक, अर्द्धप्रहर, धूम, व्यतिपात, परिवेष, इंद्रचाप व उपकेतु आदि। ये सभी छाया ग्रह की श्रेणी में आते हैं और इनकी गणना सूर्य व लग्न की गणना पर आधारित होती है। ज्योतिष में कई बार छाया ग्रह का महत्व अत्यधिक हो जाता है क्योंकि ये ग्रह अर्थात बिंदु मनुष्य के जीवन पर विषेष प्रभाव डालते हैं। पृथ्वी सूर्य की परिक्रमा एक समतल में करती है। चंद्र भी पृथ्वी की परिक्रमा एक समतल में करता है। लेकिन यह पृथ्वी के समतल से एक कोण पर रहता है। दोनों समतल एक दूसरे को एक रेखा पर काटते हैं। एक बिंदु से चंद्र ऊपर और दूसरे से नीचे जाता है। इन्हीं बिंदुओं को राहु और केतु की संज्ञा दी गई है। सूर्य, चंद्र, राहु एवं केतु जब एक रेखा में आ जाते हैं, तो चंद्र और सूर्य ग्रहण लगते हैं। जब राहु और केतु की धुरी के एक ओर सभी ग्रह आ जाते हैं, तो काल सर्प योग की उत्पत्ति होती है। राहु और केतु का प्रभाव केवल मनुष्य पर ही नहीं बल्कि संपूर्ण भूमंडल पर महसूस किया जा सकता है। जब भी राहु या केतु के साथ सूर्य और चंद्र आ जाते हैं तो ग्रहण योग बनता है। ग्रहण के समय पूरी पृथ्वी पर कुछ अंधेरा छा जाता है एवं समुद्र में ज्वार उत्पन्न होते हैं। ज्योतिष में राहु और केतु के द्वारा अनेक योगों का निर्माण होता है। इनमें काल सर्प योग सर्वाधिक चर्चित है। राहु व केतु से बनने वाले कुछ मुख्य योग निम्नलिखित हैं। राहु और केतु के मध्य सभी ग्रहों के आ जाने से काल सर्प योग बनता है। काल सर्प योग की स्थिति में जिस भाव में राहु स्थित होता है उस भाव की हानि होती है। सूर्य और राहु की युति के कारण पितृ दोष का निमार्ण होता है, जिससे जातक के कुटुंब की हानि होती है या उसे विषेष कष्ट का सामना करना पड़ता है। चार ग्रह राहु से युत हों तो मालानानाप्रद योग का निर्माण होता है। इससे जातक को राजकीय वैभव और संपत्ति की प्राप्ति होती है। राहु व गुरु की युति से गुरु चांडाल योग बनता है जिसके फलस्वरूप जातक कपटी व अविष्वासी होता है। शुक्र व राहु की युति से अभोत्वक योग, बुध व राहु की युति से जड़त्व, शनि व राहु की युति से नंदी, मंगल व राहु की युति से अंगारक एवं सूर्य और चंद्र के साथ राहु या केतु की युति से ग्रहण योग का निर्माण होता है। शनि व राहु की युति नंदी योग का निर्माण करती है, जिससे जातक यष, सुख और समृद्धि का स्वामी होता है, लेकिन जिस भाव में यह युति होती है, उस भाव के कष्ट प्रदान करती है जैसे लग्न में रोग, द्वितीय में धन संकट, तृतीय में पराक्रम की हानि, चतुर्थ में माता को कष्ट, पंचम में संतान को कष्ट, सप्तम में जीवनसाथी को कष्ट, दषम में व्यवसाय में अस्थिरता आदि। बारहवें भाव में केतु मुक्ति प्रदान करता है। ग्यारहवें भाव में राहु शक्ति योग का निर्माण करता है, जिसके कारण जातक समाज में अत्यंत प्रभावषाली होता है। साथ ही पंचम केतु जातक को दैवज्ञता प्रदान करता है और ज्योतिष आदि में उसकी रुचि जगाता है। चंद्र और राहु लग्न में हों तो जातक को भूत-प्रेत जन्य बाधाओं का सामना करना पड़ता है। उसकी मनःस्थिति कमजोर रहती है। राहु अधिष्ठित भाव का स्वामी तीसरे भाव के स्वामी के साथ हो तो सर्प भय योग का निर्माण होता है। ऊपर वर्णित तथ्यों से यह स्पष्ट हो जाता है कि जातक के जीवन में राहु और केतु की भूमिका अहम होती है। दषा फल में भी राहु की 18 वर्ष की लंबी अवधि इसकी महत्ता को दर्षाती है। गोचर में इसकी गति 18 वर्ष होने के कारण शनि के बाद यह दूसरा सर्वाधिक महत्वपूर्ण ग्रह है। राहु और केतु का सीधा संबंध चंद्र से होने के कारण इनका महत्व प्रथम श्रेणी में आ जाता है क्योंकि चंद्र से पृथ्वी की दूरी अन्य सभी ग्रहों की तुलना में सबसे कम होने के कारण पृथ्वी पर इसका प्रभाव सबसे अधिक पड़ता है। अतः राहु को सदा अपने अनुकूल बनाए रखें और इसके लिए निम्नलिखित मंत्र का नियमित रूप से जप करें। ¬ अर्धकायं महावीर्यं चन्द्रादित्यविमर्दनम्। सिंहिकागर्भसम्भूतं तं राहुं प्रणमाम्यहम्। 

 कुंडली में राहु शनि एक साथ ? उपाएँ करे !!

ज्योतिष कोई जादू की छड़ी नहीं है ! ज्योतिष एक विज्ञानं है ! ज्योतिष में जो ग्रह आपको नुकसान करते है, उनके प्रभाव को कम कर दिया जाता है और जो ग्रह शुभ फल देता है,उनके प्रभाव को बढ़ा दिया जाता है ! आज के इस युग में हर मोड़ पर ज्योतिष की दूकान मिल जाएगी पर दुःख की बात यह है आजकल ज्योतिष किताबी ज्ञान रखते है वास्तविकता से कोसो दूर है ! किसी ज़माने में ज्योतिष का काम बहुत पवित्र होता था पर आज के ज्योतिष तो बस यजमान को ठगने में लगे है ! हमारे ज्योतिष आचार्यो ने शनि को छेवे आठवे दशवे और बारवे भाव का पक्का कारक माना है जबकि राहु एक छाया ग्रह है ! एक मान्यता के अनुसार राहु और केतु का फल देखने के लिए पहले शनि को देखा जाता है क्योंकि यदि शनि शुभ फल दे रहे हो तो राहु और केतु अशुभ फल नहीं दे सकते और यह भी माना जाता है कि शनि का शुभ फल देखने के लिए चंद्रमा को देखा जाता है ! कहने का भाव यह है कि प्रत्येक ग्रह एक दुसरे पर निर्भर है ! इन सभी ग्रहों में शनि का विशेष स्थान है ! शनि से मकान और वाहन का सुख देखा जाता है साथ ही इसे कर्म स्थान का कारक भी माना जाता है,यह चाचा और ताऊ का भी कारक है ! राहु को आकस्मिक लाभ का कारक माना गया है ! राहु से कबाड़ का और बिजली द्वारा किये जाने वाले काम को देखा जाता है ! राहु का सम्बन्ध ससुराल से होता है अगर ससुराल से दुखी है तो राहु ख़राब चल रहा है ! ज्योतिष का मानना है कि राहु और केतु जिस भी ग्रह के साथ आ जाते है वो ग्रह दुषित हो जाता है और शुभ फल छोड़ देता है ! ऐसे कई योग है आज हम राहु और शनि की बात करेगे माना जाता है यदि शनि और राहु एक साथ एक ही भाव में आ जाये तो व्यक्ति को प्रेत बाधा आदि टोने टोटके बहुत जल्दी असर करते है क्योंकि शनि को प्रेत भी माना जाता है और राहु छाया है ! इसे प्रेत छाया योग भी कहा जाता है पर सामान्य व्यक्ति इसे पितृदोष कहता है ! एक कथा के अनुसार जब हनुमान जी ने राहु और केतु को हाथो में पकड़ लिया था और शनि को पूँछ में तब शनि महाराज ने कहा था आज जो हमें इस बालक से छुड़ा देगा उसे हम जीवन में कभी परेशान  नहीं करेगे यदि किसी की कुंडली में यह तीनो ग्रह परेशान कर रहे हो तो एक साबर विधि से इन्हें हनुमान जी से छूडवा दिया जाता है !
फिर यह जीवन भर परेशान नहीं करते आने वाले समय में इस विधि पर भी चर्चा करेगे,यदि राहु की बात की जाये तो राहु जब भी मुशकिल में होता है तो शनि के पास भागता है ! राहु सांप को माना गया है और शनि पाताल  मतलब धरती के नीचे सांप धरती के नीचे ही अधीक निवास करता है ! इसका एक उदहारण यह भी है कि यदि किसी चोर या मुजरिम राजनेता रुपी राहु पर मंगल रुपी पुलीस या सूर्य रुपी सरकार का पंजा पड़ता है तो वे अपने वकील  रुपी शनि के पास भागते है ! सीधी बात है राहु सदैव शनि पर निर्भर करता है पर जब शनि के साथ बैठ जाता है तो शनि के फल का नाश कर देता है ! यह सब पुलीस वकील आदि किसी न किसी ग्रह के कारक है ! शनि उस व्यक्ति को कभी बुरा फल नहीं देते जो मजदूरों और फोर्थ क्लास लोगो का सम्मान करता है क्योंकि मजदूर शनि के कारक है ! जो छोटे दर्जे के लोगो का सम्मान नहीं करता उसे शनि सदैव बुरा फल ही देते है !

    आप अपनी कुंडली ध्यान से देखे अगर आपकी कुंडली में भी राहु और शनि एक साथ बैठे है तो यह उपाय करे ! हररोज मजदूरों को तम्बाकु की पुडिया दान दे ! ऐसा ४३ दिन करे आपको कभी यह योग बुरा फल नहीं देगा क्योंकि मजदूर रुपी शनि है और तम्बाकु राहु है,जब मजदूर रुपी शनि तम्बाकु को खायेगा तो अच्छा तम्बाकु ग्रहण कर लेगा और बुरा राहु बाहर थुक देगा ! सीधी बात है शनि अच्छा राहु ग्रहण कर लेगा और बुरा राहु बाहर थुक देगा ! आप यह उपाय जरूर कीजिये मैने हजारो लोगो पर इस उपाय को आजमाया है !


इस 1 मंत्र से हो जाए शनि, राहु-केतु की घातक तिकड़ी भी बेअसर
धर्म डेस्क. उज्जैन |
इस 1 मंत्र से हो जाए शनि, राहु-केतु की घातक तिकड़ी भी बेअसर
अमावस्या तिथि के स्वामी पितृदेव माने जाते हैं। इसलिए यह पितरों के स्मरण का भी शुभ दिन है। धार्मिक परंपराओं में यह तिथि पितृदोष दूर करने का विशेष अवसर माना जाता है। ज्योतिष शास्त्रों के मुताबिक कुण्डली में शनि, राहु, केतु, सूर्य और गुरु ग्रहों की युति और उनके साथ अन्य ग्रहों के बुरे प्रभावों से पितृदोष पैदा होते हैं।
माना जाता है कि पितृदोष से परिवार के सदस्यों में कलह, आर्थिक तंगी, मतभेद, पिता-पुत्र में विवाद, उन्नति न होना जैसे कष्टों का सामना करना पड़ सकता है। इनके लिए पितृदोष शांति के उपाय जरूरी होते हैं।
अगर आप भी जीवन में ऐसी ही परेशानियों और तनाव से गुजर रहे हों तो कुण्डली में पितृदोष के कारण राहु-केतु व शनि ग्रहों की शांति के लिए 21 अप्रैल को शनिश्चरी अमावस्या पर यहां बताए सरल मंत्र व पूजा को किसी विद्वान ब्राह्मण या ज्योतिष के मार्गदर्शन में जरूर अपनाएं -
- अमावस्या पर तीर्थ स्नान के बाद शनि, राहु व केतु की मूर्तियों को काले वस्त्र पर काले अक्षतों से बने कमल जिसमें चौबीस दल बनें हों, पर विराजित करें। ध्यान रहें शनि बीच में व दाएं व बांए भाग में क्रमश: राहु व केतु की मूर्तियां रहें।
- शनि, राहु व केतु की केसरयुक्त चंदन, काले अक्षत यानी काजल मिले अक्षत, कागलहर के काले फूल, काले वस्त्र चढ़ाएं व काले तिल से बने पकवान का भोग लगाएं नीचे लिखे मंत्र का स्मरण पितृदोष पीड़ा शांति की कामना के साथ करें -
शनैश्चर नमस्तुभ्यं नमस्तेतवथ राहवे।
केतवेथ नमस्तुभ्यं सर्वशांति प्रदो भाव।।
ॐ ऊर्ध्वकायं महाघोरं चंडादित्यविमर्दनम्।
सिहिंकाया: सुतं रौद्रं तं राहुं प्रणमाम्यहम्।
ॐ पातालधूम संकाशं ताराग्रहविमर्दनम्।
रौद्रां रौद्रात्मकं क्रूरं तं केतु प्रणमाम्यहम्।।
- मंत्र स्मरण के बाद शनि, राहु व केतु की कस्तुरी धूप व तेल के दीप से आरती करें। वह ग्रहों से संबंधित वस्तुओं का दान ब्राह्मण या गरीबों को करें। जैसे काले कपड़े, लोहा, काला तिल, सोना काली उड़द आदि। इससे राहु, केतु व शनि के बुरे असर से होने वाली पीड़ाओं का अंत होता है।

 जब सताए केतु तो करें उपाय राहु के समान
केतु भी एक अशुभ एवं पापी ग्रह  माना गया है। परन्तु शुभ स्थिति में होने पर केतु ग्रह  अन्य ग्रहों की तुलना में श्रेष्ठ फल प्रदान करता है। केतु के कुपित होने पर जातक के व्यवहार में विकार आने लगते हैं, काम वासना तीव्र होने से जातक दुराचार जैसे दुष्कृत्य करने की ओर उन्मुख हो जाता है। इसके अलावा केतु ग्रह  के अशुभ प्रभाव से गर्भपात, पथरी, गुप्त एवं असाध्य रोग, खांसी, सर्दी, वात और पित्त विकार जन्य  रोग, पाचन संबंधी रोग आदि होने का अंदेशा रहता है।
 वहीँ दूसरी ओर केतु ग्रह  के अशुभ प्रभाव से जातक के जीवन में मुकदमेबाजी, झगडा, वैवाहिक जीवन में अशान्ति, पिता से मतभेद होने की संभावनाएं बढ़ जाती हैं। जन्म कुंडली के लग्न, षष्ठम, अष्ठम तथा एकादश भाव में केतु की स्थिति को शुभ नहीं माना गया है। इसके कारण जातक के जीवन में अशुभ प्रभाव ही देखने को मिलते हैं। उसका जीवन संघर्ष एवं कष्टपूर्ण स्थिति में बना रहता है। भूत-प्रेत बाधाएं भी जातक को परेशान करती हैं।
केतु के अशुभ प्रभाव से बचने के लिए जातक को लाल चन्दन की माला को अभिमंत्रित कराकर शुक्ल पक्ष के प्रथम मंगलवार को धारण करना चाहिए। केतु के मन्त्र "" पलाश पुष्प संकाशं, तारका ग्रह मस्तकं। रौद्रं रौद्रात्मकं घोरं, तम केतुम प्रण माम्य्हम "  से अभिमंत्रित असगंध की जड़ को नीले धागे में शुक्ल पक्ष के प्रथम मंगलवार को धारण करने से भी केतु ग्रह  के अशुभ प्रभाव कम होने लगते हैं। केतु ग्रह की शांति के लिए तिल, कम्बल, कस्तूरी, काले पुष्प, काले वस्त्र, उड़द की काली दाल, लोहा, कली छतरी आदि का दान भी किया जाता है। केतु के रत्न लहसुनिया को शुभ मुहूर्त में धारण करने से भी केतु ग्रह  के अशुभ प्रभाव से बचा जा सकता है। -- प्रमोद कुमार अग्रवाल

  राहु को जानिये - 1 (Rahu - Part 1)
    राहु का मुख भयंकर है। राहु को सांप का मुख कहा गया है.
    राहु की माता का नाम सिंहिका है, जो विप्रचित्ति की पत्नी तथा हिरण्यकशिपु की पुत्री थी। माता के नाम से राहु को सैंहिकेय भी कहा जाता है।
    ये सिर पर मुकुट, गले में माला तथा शरीर पर काले रंग का वस्त्र धारण करते हैं।
    इनके हाथों में तलवार, ढाल, त्रिशूल और वरमुद्रा है।
    राहु सिंह के आसन पर विराजमान हैं। ध्यान में ऐसे ही राहु प्रशस्त माने गए हैं।
    मत्स्यपुराण के अनुसार राहु का रथ अंधकार रूप है। इसे कवच आदि से सजाए हुए काले रंग के आठ घोड़े खींचते हैं।

    राहु एक छाया ग्रह है। सौरमंडल में इसका अपना कोई आस्तित्व नहीं है। भारतीय ज्योतिष के अनुसार राहु और केतु सूर्य एवं चंद्र के परिक्रमा पथों के आपस में काटने के दो बिन्दुओं के द्योतक हैं। छाया का हमारे जीवन में बहुत असर होता है। कहते हैं कि रोज पीपल की छाया में सोने वाले को किसी भी प्रकार का रोग नहीं होता लेकिन यदि बबूल की छाया में सोते रहें तो दमा या चर्म रोग हो सकता है। इसी तरह ग्रहों की छाया का हमारे जीवन में असर होता है।
    यह ग्रह वायु तत्व म्लेच्छ प्रकृति तथा नीले रंग पर अपना विशेष अधिकार रखता है।
    ध्वनि तरंगों पर राहु का विशेष अधिकार है।
    राहु-केतु का स्वतंत्र प्रभाव नहीं होता है। वे जिस राशि में या जिस ग्रह के साथ बैठते हैं, उसके प्रभाव को बढ़ाते हैं।
    बुध ग्रह हमारी बुद्धि का कारण है, लेकिन जो ज्ञान हमारी बुद्धि के बावजूद पैदा होता है उसका कारण राहु है. जैसे मान लो कि अकस्मात हमारे दिमाग में कोई विचार आया या आइडिया आया तो उसका कारण राहु है। राहु हमारी कल्पना शक्ति है तो बुध उसे साकार करने के लिए बुद्धि कौशल पैदा करता है।
राहु की कथा
समुद्रमंथन के बाद जिस समय भगवान विष्णु मोहिनी रूप में देवताओं को अमृत पिला रहे थे, उसी समय राहु देवताओं का वेष बनाकर उनके बीच में आ बैठा और देवताओं के साथ उसने भी अमृत पी लिया। परंतु तत्क्षण चंद्रमा और सूर्य ने उसकी असलियत बता दी।
अमृत पिलाते-पिलाते ही भगवान ने अपने तीक्ष्ण धारवाले सुदर्शन चक्र से उसका सिर काट डाला। भगवान विष्णु के चक्र से कटने पर सिर राहु कहलाया और धड़ केतु के नाम से प्रसिद्ध हुआ। परंतु अमृत का संसर्ग होने से वह अमर हो गया फलस्वरूप ब्रह्माजी ने उसे ग्रह बना दिया। तभी से अन्य ग्रहों के साथ राहु भी ब्रह्मा की सभा में बैठता है।


राहु की विशेषता
ईष्ट देवी : सरस्वती
रंग : नीला , काला
नक्षत्र : आर्द्रा, स्वाती, शतभिषा
गुण : सोचने की ताकत, डर, शत्रुता
शक्ति : कल्पना शक्ति का स्वामी, पूर्वाभास तथा अदृश्य को देखने की शक्ति।
शरीर का भाग : ठोड़ी, सिर, कान, जिह्वा
पशु : काँटेदार जंगली चूहा, हाथी, बिल्ली व सर्प
वृक्ष : नारियल का पेड़, कुत्ता घास
वस्तु : नीलम, सिक्का, गोमेद, कोयला
फूल : नीले
कारक - दादा, वाणी की कठोरता, खोजी, प्रवृत्ति, विदेश प्रवास भ्रमण, अभाव, चमड़ी पर धब्बांे, त्वचा रोग, सांप के काटने, जहर, महामारी, पर स्त्री से संबंध, नाना-नानी, निरर्थक तर्क-वितर्क, कपट, धोखे, वैधव्य, दर्द और सूजन, ऊंची आवाज से कमजोरों को दबाने, और दिल को ठेस पहुंचाने की प्रवृत्ति, अंधेरे, चुगलखोरी, पाखंड, बुरी आदतों, भूख व डर से दिल बैठने की अवस्था, अंग-भंग, कुष्ठ रोग, ताकत, खर्चे, मान-मर्यादा, शत्रु, देश से निस्कासन, तस्करी, जासूसी, आत्महत्या, शिकार, गुलामी, पत्थर, र्नै त्य कोण.
राहु शिव के अनन्य भक्त हैं। एक श्लोक में इन्हें भगवान नीलकण्ठ के ह्वदय में वास करने वाला कहा गया है-
कालदृष्टि कालरूपा: श्रीकण्ठ: ह्वदयाश्रय:। विद्युन्तदाह: सैहिंकयो घोररूपा महाबला: || 

 केतु ग्रह / Ketu
    केतु भी राहु की भांति ही एक छाया ग्रह हैं
    शास्त्रों में कहा गया है "कुजवत केतु" अर्थात नैसर्गिक रूप से केतु मंगल के समान फल देता है।
    केतु किसी भी भाव में स्वग्रही ग्रह के साथ बैठा हो तो वह उस भाव और साथी ग्रह के प्रभाव तथा शुभ अशुभ फल में चार गुने की वृद्धि कर देता है।
    केतु जिस भाव में बैठेगा उस भाव का अचानक आश्चर्य चकित कर देने वाला फल देगा.
    यह ग्रह तीन नक्षत्रों का स्वामी है: अश्विनी, मघा एवं मूल
    केतु जातक के मोक्ष का कारक होता है। विशेषतया बारहवे भाव में केतु मुक्ति प्रदान करता है।
    केतु विष्णु के मत्स्य अवतार से संबंधित है।
    कुछ लोग केतु को उत्तर-पश्चिम दिशा का कारक ग्रह मानते हैं।

केतु ग्रह की अनुकूलता हेतु
आराध्य देव - श्री गणेश जी
वैदिक उपाय : वैदिक मंत्र का अट्ठारह हजार जप करना चाहिए।
“ऊँ केतुं कृण्वन्न केतवे पेशो मर्या अपे से समुषभ्दिंरिजायथाः।”
तांत्रिक मंत्र केतु के किसी भी तांत्रिक मंत्र का बहत्तर हजार जप करना चाहिए।
    ऊँ ऐं ह्रीं केतवे नमः।
    ऊँ कें केतवे नमः।
दान : सात प्रकार के अन्न, बकरा, कपिला गौ दान, दो रंग का कंबल, भूरे रंग के वस्त्र , खट्टे स्वाद वाले फल, उड़द, कस्तूरी, लहसुनिया, काला फूल, तिल, तेल, रत्न, सोना, लोहा ।
पूजन :
    केतु के अशुभ फल समाप्त करने के लिए गणपति की उपासना ही सर्वोपरि है। गणपति सहस्त्रनाम का पाठ, अथर्वशीर्ष का अनुष्ठान अथवा गणपति की किसी भी अन्य तरह से उपासना करनी चाहिए।
    हनुमान जी की उपासना, हनुमान अष्टक तथा बजरंग बाण का पाठ नित्य करें।
    शनि तथा मंगलवार को हनुमान जी के दर्शन कर बेसन के लड्डू का भोग लगावें। संभव हो तो शनिवार और मंगलवार को सिंदूर और चोला भी चढ़ाना चाहिए।
    भैरवजी की उपासना करें। केले के पत्ते पर चावल का भोग लगाएं।
    प्रतिदिन द्वादश ज्योतिर्लिंग के नाम का उच्चारण करना चाहिये।
हवन : रात्रि काल कुशा की समिधा से हवन करना चाहिए।
औषधि स्नान : लोबान, तिलपत्र, पुत्थरा
रूद्राक्ष : नौमुखी और छह मुखी रुद्राक्ष को चांदी का किनारा लगा कर दाहिनी बांह पर धारण करना चाहिए। धारण करने से पूर्व शिवजी के भैरव रूप की पूजा करनी चाहिए।
रत्न धारण : लहसुनियां 7 से 9 रत्ती तक चांदी या तांबे में मढ़वा कर कच्चे दूध एवं गंगा जल से धो कर, प्राण प्रतिष्ठा कर, सीधे हाथ की अनामिका उंगली में धारण करना चाहिए।
औषधि धारण : अश्व गंध को लाल कपड़े में यंत्र जैसा बांध कर, सीधे हाथ में बांधना चाहिए। कच्चे दूध के बाद गंगा जल से धोना आवश्यक है।
व्रत उपवास : केतु की प्रसन्नता के लिए शनिवार और मंगलवार को व्रत करना चाहिए। उपवास के बाद सायं काल हनुमान जी के आगे धूप, दीप जलाने के पश्चात् मीठा भोजन करना चाहिए। यदि नमक न खाएं तो उत्तम है।
दोनों पक्षों की त्रयोदशी तिथि को भी केतु के निमित्त व्रत रखा जाता है।
उपाय
    केतु अगर भूमि/पृथ्वी तत्त्व राशि / Earth Element Sign (वृष,कन्या,मकर) में स्थित है तो नीम के पेड़ लगाना केतु के अशुभ प्रभाव को दूर करके शुभ फल प्राप्त करने का बहुत अच्छा उपाय है।
    एक गिरिगोला के ऊपर के पार्ट में छोटा छेद कर उसमे भुनी हुआ आटा और शक्कर मिला कर पीपल के वृक्ष के निचे मट्टी हटा कर दबा दे। ये प्रयोग केतु के अशुभ प्रभाव दूर करने का रामबाण है। वैसे केतु अगर भूमि/पृथ्वी तत्त्व राशि / Earth Element Sign (वृष,कन्या,मकर) में स्थित है तो हर किसी को जरूर करना चाहिए।
    कुत्ते को खाना खिलावें। शनिवार को कुत्तों को गुलाबजामुन या दूसरी मीठी चीजें खिलाएं।
    शिव मंदिर में ध्वज लगाने से भी केतु शांत होता है। केतु को ध्वज का प्रतीक भी माना जाता है।
    नेत्रहीन, कोढ़ी, अपंग को एक से अधिक रंग का कपड़ा दान करें।
    केतु अगर जल तत्त्व राशि / Water Element Sign (कर्क, वृश्चिक, मीन ) में स्थित है तो काले या सफेद तिल को काले वस्त्र में बांधकर बहते पानी में प्रवाहित करें। बरफी के चार टुकड़े बहते पानी में बहाएं। लकड़ी के चार टुकड़े चार दिन तक बहते पानी में प्रवाहित करें। कोयले के आठ टुकड़े बहते पानी में प्रवाहित करें।
    केतु अगर अग्नि तत्त्व राशि / Fire Element (मेष, सिंह, धनु) में हो तो केतु के निमित्त रात्रि काल कुशा की समिधा से हवन करना ही सर्वथा उचित है।
    केतु के अशुभ प्रभाव से बचने के लिए जातक को लाल चन्दन की माला को अभिमंत्रित कराकर शुक्ल पक्ष के प्रथम मंगलवार को धारण करना चाहिए।
    पैर में या पेशाब में कोई तकलीफ हो तो शुद्ध रेशम का उजला धागा धारण करें।
    भूरा कुत्ता घर में पालें।
    हरा रुमाल सदैव अपने साथ में रखें।
    तिल के लड्डू सुहागिनों को खिलाएं और तिल का दान करें।
    कन्याओं को रविवार के दिन मीठा दही और हलवा खिलाएं।
    कृष्ण पक्ष में प्रतिदिन शाम को एक दोने में पके हुए चावल लेकर उस पर मीठा दही डाल लें और काले तिल के कुछ दानों को रख दान करें। यह दोना पीपल के नीचे रखकर केतु दोष शांति के लिए प्रार्थना करें।
    सूर्य केतु की युति होने पर सूर्य ग्रहण के समय तिल,नींबू,पका केला बहते पानी जैसे नदी में बहायें।
    बारहवे भाव के केतु के लिये बारह पताकायें बारह बार धर्म स्थान पर लगाना
    यदि केतु रोग कारक हो तो रोग ग्रस्त जातक स्वयं अपने हाथों से कम से कम 7 बुधवार भिक्षुकों को हलुआ वितरण करे तो लाभ होगा।
    केतु की शांति के लिए नवरात्रि में छिन्न्ामस्तादेवी का 9 दिनी अनुष्ठान कराएं।
केतु महादशा उपाय (Remedies for Ketu Mahadasha)
    अगर आप केतु की महादशा से पीड़ित हैं तो ऊपर बताये गए उपायों में से जो आप सहजता से कर सकें वो करें।
    भगवान् गणेश का एक लॉकेट अपने गले में इस तरह धारण करें की वो हमेशा आपके ह्रदय के पास रहे।
    प्रतिदिन गणेश जी पूजा करनी चाहिए और गणपति जी को लड्डू का भोग लगाना चाहिए. 
    कन्याओं को भोजन करवाकर दक्षिणा सहित विदा करना चाहिए. 
ऊपर बताये गए उपायों के अलावा महादशा-अन्तर्दशा के कुछ और उपाय निम्न प्रकार करें। ध्यान रहे इनके साथ केतु के सामान्य उपाय भी जरूर करें
केतु महादशा - केतु अन्तर्दशा : दुर्गा सप्तशती का पाठ करें और महामृत्युंजय मंत्र का जप करें। साथ ही केतु के मंत्र का भी जप करें।
केतु महादशा - शुक्र अन्तर्दशा : माँ दुर्गा की उपासना करें , दुर्गा सप्तशती का पाठ करें
केतु महादशा - सूर्य अन्तर्दशा : कपिला गौ दान, शिव मंदिर में रुद्राभिषेक करें
केतु महादशा - चन्द्र अन्तर्दशा : पारद शिवलिंग का कच्चे दूध से अभिषेक करें, दुर्गासूक्त और चंद्रस्तोत्र  का पाठ करें।
केतु महादशा - मंगल अन्तर्दशा : हनुमान जी की उपासना, हनुमान अष्टक तथा बजरंग बाण का पाठ नित्य करें। शनि तथा मंगलवार को हनुमान जी के दर्शन कर बेसन के लड्डू का भोग लगावें। संभव हो तो शनिवार और मंगलवार को सिंदूर और चोला भी चढ़ाना चाहिए।
केतु महादशा - राहु अन्तर्दशा : दुर्गा सप्तशती का पाठ करें और महामृत्युंजय मंत्र का जप करें। गणेश मंदिर में नारियल तोडें। कोयले के आठ टुकड़े बहते पानी में प्रवाहित करें। भैरवजी की उपासना करें।
केतु महादशा - गुरु अन्तर्दशा : शिव सहस्त्रनाम का पाठ करें
केतु महादशा - शनि अन्तर्दशा : कपिला गौ दान, महामृत्युंजय मंत्र का जप करें
केतु महादशा - बुध अन्तर्दशा : विष्णु सहस्त्रनाम का पाठ करें। गणेश जी की पूजा करें। चतुर्थी वाले दिन गणेश जी की विशेष पूजा करें , बकरी दान करें।

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