Tuesday, September 17, 2013

गणपति हवन विधि : हवन का वैज्ञानिक स्वरुप :वास्तु शास्त्र के अनुसार :Scientific aspects of Havan (oblations to the fire) : Krishna Janmashtami:

 वास्तु शास्त्र के अनुसार कैसे हो भगवान गणेश
वास्तु में वर्णित है हर कामना के खास गणपति
घर में सुख-शांति और रिद्धि-सिद्धि के लिए गणेश जी की स्थापना की जाती है। अगर यह स्थापना वास्तु के अनुसार की जाए तो इसका फल और भी अधिक हो जाता है। जानिए वास्तु शास्त्र के अनुसार कैसे हो भगवान गणेश
वास्तु में गणपति की मूर्ति एक, दो, तीन, चार और पांच सिरों वाली पाई जाती है। इसी तरह गणपति के 3 दांत पाए जाते हैं। सामान्यत: 2 आंखें पाई जाती हैं, किंतु तंत्र मार्ग संबंधी मूर्तियों में तीसरा नेत्र भी देखा गया है।
भगवान गणेश की मूर्तियां 2, 4, 8 और 16 भुजाओं वाली भी पाई जाती हैं। 14 प्रकार की महाविद्याओं के आधार पर 12 प्रकार की गणपति प्रतिमाओं के निर्माण से वास्तु जगत में तहलका मच गया है।
* संतान गणपति- भगवान गणपति के 1008 नामों में से संतान गणपति की प्रतिमा उस घर में स्थापित करनी चाहिए जिनके घर में संतान नहीं हो रही हो। वे लोग संतान गणपति की विशिष्ट मंत्र पूरित प्रतिमा द्वार पर लगाएं जिसका प्रतिफल सकारात्मक होता है।
* विघ्नहर्ता गणपति- विघ्नहर्ता भगवान गणपति की प्रतिमा उस घर में स्थापित करनी चाहिए, जिस घर में कलह, विघ्न, अशांति, क्लेश, तनाव, मानसिक संताप आदि दुर्गुण होते हैं। पति-पत्नी में मनमुटाव, बच्चों में अशांति का दोष पाया जाता है। ऐसे घर में प्रवेश द्वार पर मूर्ति स्थापित करनी चाहिए।
* विद्या प्रदायक गणपति- बच्चों में पढ़ाई के प्रति दिलचस्पी पैदा करने के लिए गृहस्वामी को विद्या प्रदायक गणपति अपने घर के प्रवेश द्वार पर स्थापित करना चाहिए।
* विवाह विनायक- गणपति के इस स्वरूप का आह्वान उन घरों में विधि-विधानपूर्वक होता है, जिन घरों में बच्चों के विवाह जल्द तय नहीं होते।
* चिंतानाशक गणपति- जिन घरों में तनाव व चिंता बनी रहती है, ऐसे घरों में चिंतानाशक गणपति की प्रतिमा को 'चिंतामणि चर्वणलालसाय नम:' जैसे मंत्रों का सम्पुट कराकर स्थापित करना चाहिए।
* धनदायक गणपति- आज हर व्यक्ति दौलतमंद होना चाहता है इसलिए प्राय: सभी घरों में गणपति के इस स्वरूप वाली प्रतिमा को मंत्रों से सम्पुट करके स्थापित किया जाता है ताकि उन घरों में दरिद्रता का लोप हो, सुख-समृद्धि व शांति का वातावरण कायम हो सके।
* सिद्धिनायक गणपति- कार्य में सफलता व साधनों की पूर्ति के लिए सिद्धिनायक गणपति को घर में लाना चाहिए।
* सोपारी गण‍पति- आध्यात्मिक ज्ञानार्जन हेतु सोपारी गण‍पति की आराधना करनी चाहिए।
* शत्रुहंता गण‍पति- शत्रुओं का नाश करने के लिए शत्रुहंता गणपति की आराधना करना चाहिए।
* आनंददायक गणपति- परिवार में आनंद, खुशी, उत्साह व सुख के लिए आनंददायक गणपति की प्रतिमा को शुभ मुहूर्त में घर में स्‍थापित करना चाहिए
विजय सिद्धि गणपति- मुकदमे में विजय, शत्रु का नाश करने, पड़ोसी को शांत करने के उद्देश्य से लोग अपने घरों में 'विजय स्थिराय नम:' जैसे मंत्र वाले बाबा गणपति की प्रतिमा के इस स्वरूप को स्था‍पित करते हैं।
* ऋणमोचन गणपति- कोई पुराना ऋण, जिसे चुकता करने की स्थिति में न हो, तो ऋण मोचन गणपति घर में लगाना चाहिए।
रोगनाशक गणपति- कोई पुराना रोग हो, जो दवा से ठीक न होता है, उन घरों में रोगनाशक गणपति की आराधना करनी चाहिए।
* नेतृत्व शक्ति विकासक गण‍पति- राजनीतिक परिवारों में उच्च पद प्रतिष्ठा के लिए लोग गणपति के इस स्वरूप की आराधना प्राय: इन मंत्रों से करते हैं- 'गणध्याक्षाय नम:, गणनायकाय नम: प्रथम पूजिताय नम:।'





 Scientific aspects of Havan (oblations to the fire) देव यज्ञ = हवन का वैज्ञानिक स्वरुप अथ हवन विधि

 गणपति हवन विधि
एक सरल हवन विधान प्रस्तुत है जो आप आसानी से स्वयम कर सकते हैं ।
ऊं अग्नये नमः .........७ बार इस मन्त्र का जाप करें तथा आग जला लें
ऊं गुरुभ्यो नमः ..... २१ बार इस मन्त्र का जाप करें ।
ऊं अग्नये स्वाहा ...... ७ आहुति (अग्नि मे डालें)
ऊं गं  स्वाहा ..... १ बार
ऊं भैरवाय स्वाहा ..... ११ बार
ऊं गुरुभ्यो नमः स्वाहा .....१६ बार
ऊं गं गणपतये स्वाहा ..... १०८ बार
अन्त में कहें कि गणपति भगवान की कृपा मुझे प्राप्त हो....
गलतियों के लिये क्षमा मांगे.....
तीन बार पानी छिडककर शांति शांति शांति ऊं कहें.....

  हवन विधिHavan method

ब्रह्मणा अन्वारब्ध आहुति दद्यात्
ॐ प्रजापतये स्वाहा । इदं प्रजापतये , इदं न मम ।
ॐ इन्द्राय स्वाहा । इदमिन्द्राय , इदं न मम ।

ॐ अग्नये स्वाहा । इदमग्नये , इदं न मम ।

ॐ सोमाय स्वाहा । इदं सोमाय , इदं न मम ।
बिना अन्वारब्धमेका आहुति : ।
ब्रह्माजी से मोली सम्बन्ध हटाकर एक आहुति दें । यथा -
ॐ प्रजापतये स्वाहा । इदं प्रजापतये , इदं न मम ॥
पुन : अग्नि का ध्यान , आवाहन , पंचोपचार पूजन करें ।
तत : अग्ने सप्तजिह्वानां पूजयेत्
ॐ कनकायै नम :, ॐ रक्तायै नम :, ॐ कृष्णायै नम :, ॐ उदगारिण्ये नम :, ॐ उत्तरमुखे सुप्रभायै नम :, ॐ बहुरूपायै नम :, ॐ अतिरिक्तायै नम : । तदनन्तरं स्त्रुवसमिद्वनस्पतीनीं पूजनम् चेति ॥
अथ पचंवारुणी ( प्रायश्चित्तोहोम : )
ॐ त्वन्नो अग्रे वरुणस्य विद्वान् देवस्य हेडो भवयासिसीष्ठा : । यजिष्ठो वह्नितम : शोशुचानो विश्वा द्वेषां सि प्रमुमुग्ध्यस्मत् स्वाहा । इदमग्निवरुणाभ्याम् स्वाहा : ॥
ॐ सत्वन्नोऽअग्ने वमो भवोती नेदिष्ठोऽअस्याऽउषसो व्युष्टौ । अवयक्ष्व नो वरुण रराणो वीहि मृडीक सुहवो न एधि स्वाहा । ईदमग्नि वरुणाभ्याम् स्वाहा : ।
ॐ अयाश्चाग्रेऽस्यनभिशस्तिपाश्च सत्वमित्वमयाऽअसि । अयोनो । यज्ञं वहास्ययानो धेहि भेषज् स्वाहा । इदमग्नये स्वाहा ॥
ॐ ये ते शतं वरुन ये सहस्त्रं यज्ञिया : पाशा विवता : महात : । तेभिर्नोऽअद्यसवितोत विष्णुर्विश्वे मुञ्चन्तु मरुत : स्वर्का : स्वाहा । इदं वरुणाय सवित्रे विष्णवे विश्वेभ्योदेवेभ्यो मरुद्‌भ्य : स्वर्केभ्य : स्वाहा : ।
ॐ उदुत्तमं वरुण पाशभस्म दवाधमं विमध्य श्रथाय । अथ वयमादित्यव्रते तवानागसोअदितये स्याम स्वाहा ।
इदं वरुणायादित्याया - दितये स्वाहा : ॥ अन्नोदक स्पर्श इति पंचवारुणी अथवा प्रायश्चित होम : ।

ततो गणपतिप्रीत्यर्थं होम :
ॐ गणानां त्वा गणपति हवामहे । प्रियाणां त्वा प्रियपति हवामहे ॥ निधीनां त्वां निधिपति हवामहे ।
वसो मम आहमजानि गर्भधमात्व मजासि गर्भद्यम् । ॐ गणपतये स्वाहा : ॥

---------------------------------------------------------------- 

   श्री गणेश जी की पूजन विधि
गणेश पूजन (सरलतम विधि )
लम्बी सूंड, बड़ी आँखें ,बड़े कान ,सुनहरा सिन्दूरी वर्ण यह ध्यान करते ही प्रथम पूज्य श्री गणेश जी का पवित्र स्वरुप हमारे सामने आ जाता है | सुखी व सफल जीवन के इरादों से आगे बढऩे के लिए बुद्धिदाता भगवान श्री गणेश के नाम स्मरण से ही शुरुआत शुभ मानी जाती है। जीवन में प्रसन्नता और हर छेत्र में सफलता प्राप्त करने हतु श्री गजानन महाराज के पूजन की सरलतम विधि विद्वान पंडित जी द्वारा बताई गयी है ,जो की आपके लिए प्रस्तुत है -प्रातः काल शुद्ध होकर गणेश जी के सम्मुख बैठ कर ध्यान करें और पुष्प, रोली ,अछत आदि चीजों से पूजन करें और विशेष रूप से सिन्दूर चढ़ाएं तथा दूर्बा दल(११या २१ दूब का अंकुर )समर्पित करें|यदि संभव हो तो फल और मीठा चढ़ाएं (मीठे में गणेश जी को मूंग के लड्डू प्रिय हैं ) |
अगरबत्ती और दीप जलाएं और नीचे लिखे सरल मंत्रों का मन ही मन 11, 21 या अधिक बार जप करें :-
     ॐ चतुराय नम: |
           ॐ गजाननाय नम: |
           ॐ विघ्रराजाय नम: |
           ॐ प्रसन्नात्मने नम: |
पूजा और मंत्र जप के बाद श्री गणेश आरती कर सफलता व समृद्धि की कामना करें।
 सामान्य पूजन
पूजन सामग्री (सामान्य पूजन के लिए ) -शुद्ध जल,गंगाजल,सिन्दूर,रोली,रक्षा,कपूर,घी,दही,दूब,चीनी,पुष्प,पान,सुपारी,रूई,प्रसाद (लड्डू गणेश जी को बहुत प्रिय है) |
विधि- गणेश जी की मूर्ती सामने रखकर और श्रद्धा पूर्वक उस पर पुष्प छोड़े यदि मूर्ती न हो तो सुपारी पर मौली लपेटकर चावल पर स्थापित करें और आवाहन मंत्र पढकर अक्षत डालें |
                                                   
ध्यान श्लोक -   शुक्लाम्बर धरं विष्णुं शशि वर्णम् चतुर्भुजम् . प्रसन्न वदनं ध्यायेत् सर्व विघ्नोपशान्तये ..
षोडशोपचार पूजन -  ॐ सिद्धि विनायकाय नमः . ध्यायामि . ॐ सिद्धि विनायकाय नमः . आवाहयामि . ॐ सिद्धि विनायकाय नमः . आसनं समर्पयामि . ॐ सिद्धि विनायकाय नमः . अर्घ्यं समर्पयामि . ॐ सिद्धि विनायकाय नमः . पाद्यं समर्पयामि . ॐ सिद्धि विनायकाय नमः . आचमनीयं समर्पयामि . ॐ सिद्धि विनायकाय नमः . उप हारं समर्पयामि . ॐ सिद्धि विनायकाय नमः . पंचामृत स्नानं समर्पयामि . ॐ सिद्धि विनायकाय नमः . वस्त्र युग्मं समर्पयामि . ॐ सिद्धि विनायकाय नमः . यज्ञोपवीतं धारयामि . ॐ सिद्धि विनायकाय नमः . आभरणानि समर्पयामि . ॐ सिद्धि विनायकाय नमः . गंधं धारयामि . ॐ सिद्धि विनायकाय नमः . अक्षतान् समर्पयामि . ॐ सिद्धि विनायकाय नमः . पुष्पैः पूजयामि . ॐ सिद्धि विनायकाय नमः . प्रतिष्ठापयामि .
और गणेश जी के इन नामों का जप करें  -
 

Ganesha Chant these names -Ganesh Namvli -108

गणेश नामवली-108

ॐ गणपतये नमः॥ ॐ गणेश्वराय नमः॥ ॐ   गणक्रीडाय नमः॥
ॐ गणनाथाय नमः॥ ॐ गणाधिपाय नमः॥ ॐ एकदंष्ट्राय नमः॥
ॐ   वक्रतुण्डाय नमः॥ ॐ गजवक्त्राय नमः॥ ॐ मदोदराय नमः॥
ॐ लम्बोदराय नमः॥ ॐ धूम्रवर्णाय नमः॥ ॐ विकटाय नमः॥
ॐ विघ्ननायकाय नमः॥ ॐ सुमुखाय नमः॥ ॐ   दुर्मुखाय नमः॥
ॐ बुद्धाय नमः॥ ॐविघ्नराजाय नमः॥ ॐ गजाननाय नमः॥
ॐ   भीमाय नमः॥ ॐ प्रमोदाय नमः ॥ ॐ आनन्दाय नमः॥
ॐ सुरानन्दाय नमः॥ ॐमदोत्कटाय नमः॥ ॐ हेरम्बाय नमः॥
ॐ शम्बराय नमः॥ ॐशम्भवे नमः ॥ॐ   लम्बकर्णाय नमः ॥ॐ महाबलाय नमः॥ॐ नन्दनाय नमः ॥ॐ
अलम्पटाय नमः ॥ॐ   भीमाय नमः ॥ॐमेघनादाय नमः ॥ॐ गणञ्जयाय नमः ॥ॐ विनायकाय नमः
॥ॐविरूपाक्षाय नमः ॥ॐ धीराय नमः ॥ॐ शूराय नमः ॥ॐवरप्रदाय नमः ॥ॐ   महागणपतये नमः ॥ॐ
 बुद्धिप्रियायनमः ॥ॐ क्षिप्रप्रसादनाय नमः ॥ॐ   रुद्रप्रियाय नमः॥ॐ गणाध्यक्षाय नमः ॥ॐ उमापुत्राय नमः ॥
ॐ अघनाशनायनमः ॥ॐ कुमारगुरवे नमः ॥ॐ ईशानपुत्राय नमः ॥ॐमूषकवाहनाय नः ॥
ॐ   सिद्धिप्रदाय नमः॥ॐ सिद्धिपतयेनमः ॥ॐ सिद्ध्यै नमः ॥ॐ सिद्धिविनायकाय नमः॥
ॐ विघ्नाय नमः ॥ॐ तुङ्गभुजाय नमः ॥ॐ सिंहवाहनायनमः ॥ॐ मोहिनीप्रियाय   नमः ॥
ॐ कटिंकटाय नमः ॥ॐराजपुत्राय नमः ॥ॐ शकलाय नमः ॥ॐ सम्मिताय नमः॥
ॐ   अमिताय नमः ॥ॐ कूश्माण्डगणसम्भूताय नमः ॥ॐदुर्जयाय नमः ॥ॐ धूर्जयाय नमः ॥
ॐ   अजयाय नमः ॥ॐभूपतये नमः ॥ॐ भुवनेशाय नमः ॥ॐ भूतानां पतये नमः॥

ॐ   अव्ययाय नमः ॥ॐ विश्वकर्त्रे नमः ॥ॐविश्वमुखाय नमः ॥ॐ विश्वरूपाय नमः ॥

ॐ   निधये नमः॥ॐ घृणये नमः ॥ॐ कवये नमः ॥ॐ कवीनामृषभाय नमः॥
ॐ   ब्रह्मण्याय नमः ॥ ॐ ब्रह्मणस्पतये नमः ॥ॐज्येष्ठराजाय नमः ॥ॐ निधिपतये   नमः ॥
ॐनिधिप्रियपतिप्रियाय नमः ॥ॐ हिरण्मयपुरान्तस्थायनमः ॥ॐ   सूर्यमण्डलमध्यगाय नमः ॥
ॐकराहतिध्वस्तसिन्धुसलिलाय नमः ॥ॐ पूषदन्तभृतेनमः ॥ॐ उमाङ्गकेळिकुतुकिने नमः ॥
ॐ मुक्तिदाय नमः ॥ॐकुलपालकाय नमः ॥ॐ   किरीटिने नमः ॥ॐ कुण्डलिने नमः॥
ॐ हारिणे नमः ॥ॐ वनमालिने नमः ॥ॐ   मनोमयाय नमः ॥ॐवैमुख्यहतदृश्यश्रियै नमः ॥
ॐ पादाहत्याजितक्षितयेनमः   ॥ॐ सद्योजाताय नमः ॥ॐ स्वर्णभुजाय नमः ॥
ॐमेखलिन नमः ॥ॐ   दुर्निमित्तहृते नमः ॥ॐदुस्स्वप्नहृते नमः ॥ॐ प्रहसनाय नमः ॥
ॐ गुणिनेनमः ॥ॐ नादप्रतिष्ठिताय नमः ॥ॐ सुरूपाय नमः ॥ॐसर्वनेत्राधिवासाय नमः ॥
ॐ   वीरासनाश्रयाय नमः ॥ॐपीताम्बराय नमः ॥ॐ खड्गधराय नमः ॥
ॐखण्डेन्दुकृतशेखराय नमः ॥ॐ चित्राङ्कश्यामदशनायनमः ॥ॐ फालचन्द्राय नमः ॥
ॐ   चतुर्भुजाय नमः ॥ॐयोगाधिपाय नमः ॥ॐ तारकस्थाय नमः ॥ॐ पुरुषाय नमः॥
ॐ   गजकर्णकाय नमः ॥ॐ गणाधिराजाय नमः ॥ॐविजयस्थिराय नमः ॥
ॐ गणपतये नमः ॥ॐ   ध्वजिने नमः ॥ॐदेवदेवाय नमः ॥ॐ स्मरप्राणदीपकाय नमः ॥
ॐ वायुकीलकायनमः   ॥ॐ विपश्चिद्वरदाय नमः ॥ॐ नादाय नमः ॥
ॐनादभिन्नवलाहकाय नमः ॥ॐ   वराहवदनाय नमः ॥ॐमृत्युञ्जयाय नमः ॥

ॐ व्याघ्राजिनाम्बराय नमः ॥ॐइच्छाशक्तिधराय नमः ॥ॐ देवत्रात्रे नमः ॥

ॐदैत्यविमर्दनाय नमः ॥ॐ   शम्भुवक्त्रोद्भवाय नमः

॥ॐ शम्भुकोपघ्ने नमः ॥ॐ शम्भुहास्यभुवे नमः ॥ॐशम्भुतेजसे नमः ॥ॐ शिवाशोकहारिणे नमः ॥
ॐगौरीसुखावहाय नमः ॥ॐ   उमाङ्गमलजाय नमः ॥ॐगौरीतेजोभुवे नमः ॥
ॐ स्वर्धुनीभवाय नमः ॥ॐयज्ञकायाय नमः ॥ॐ महानादाय नमः ॥ॐ गिरिवर्ष्मणे नमः ॥
ॐ शुभाननाय नमः ॥ॐ   सर्वात्मने नमः ॥ॐसर्वदेवात्मने नमः ॥ॐ ब्रह्ममूर्ध्ने नमः ॥
ॐककुप्छ्रुतये नमः ॥ॐ ब्रह्माण्डकुम्भाय नमः ॥ॐ
चिद्व्योमफालाय नमः ॥ॐ   सत्यशिरोरुहाय नमः ॥ॐजगज्जन्मलयोन्मेषनिमेषाय नमः ॥
ॐ अग्न्यर्कसोमदृशेनमः   ॥ॐ गिरीन्द्रैकरदाय नमः ॥ॐ धर्माय नमः ॥ॐधर्मिष्ठाय नमः ॥
ॐ   सामबृंहिताय नमः ॥ॐग्रहर्क्षदशनाय नमः ॥ॐ वाणीजिह्वाय नमः ॥ॐवासवनासिकाय नमः ॥
ॐ कुलाचलांसाय नमः ॥ॐसोमार्कघण्टाय नमः ॥ॐ   रुद्रशिरोधराय नमः ॥
ॐनदीनदभुजाय नमः ॥ॐ सर्पाङ्गुळिकाय नमः ॥ॐतारकानखाय नमः ॥
ॐ भ्रूमध्यसंस्थतकराय नमः ॥ॐब्रह्मविद्यामदोत्कटाय नमः   ॥ ॐ व्योमनाभाय नमः॥
ॐ श्रीहृदयाय नमः ॥ॐ मेरुपृष्ठाय नमः ॥ॐअर्णवोदराय नमः ॥
ॐ कुक्षिस्थयक्षगन्धर्वरक्षःकिन्नरमानुषाय नमः||
उत्तर पूजा - ॐ सिद्धि विनायकाय नमः . धूपं आघ्रापयामि . ॐ सिद्धि विनायकाय नमः . दीपं दर्शयामि . ॐ सिद्धि विनायकाय नमः . नैवेद्यं निवेदयामि . ॐ सिद्धि विनायकाय नमः . फलाष्टकं समर्पयामि . ॐ सिद्धि विनायकाय नमः . ताम्बूलं समर्पयामि . ॐ सिद्धि विनायकाय नमः . कर्पूर नीराजनं समर्पयामि . ॐ सिद्धि विनायकाय नमः . मंगल आरतीं समर्पयामि . ॐ सिद्धि विनायकाय नमः . पुष्पांजलिः समर्पयामि
यानि कानि च पापानि जन्मान्तर कृतानि च |
तानि तानि विनश्यन्ति प्रदक्षिण पदे पदे ..|
प्रदक्षिणा नमस्कारान् समर्पयामि . ॐ सिद्धि विनायकाय नमः . समस्त राजोपचारान् समर्पयामि . ॐ सिद्धि विनायकाय नमः . मंत्र पुष्पं समर्पयामि |
वक्रतुण्ड महाकाय सूर्यकोटि समप्रभ |
निर्विघ्नं कुरु मे देव सर्व कार्येषु सर्वदा |
प्रार्थनां समर्पयामि |
आवाहनं न जानामि न जानामि विसर्जनं |
पूजाविधिं न जानामि क्षमस्व पुरुषोत्तम |
क्षमापनं समर्पयामि |
ॐ सिद्धि विनायकाय नमः . पुनरागमनाय च ||
                                   
                                     वृहद पूजन विधि
पूजन सामग्री (वृहद् पूजन के लिए ) -शुद्ध जल,दूध,दही,शहद,घी,चीनी,पंचामृत,वस्त्र,जनेऊ,मधुपर्क,सुगंध,लाल चन्दन,रोली,सिन्दूर,अक्षत(चावल),फूल,माला,बेलपत्र,दूब,शमीपत्र,गुलाल,आभूषण,सुगन्धित तेल,धूपबत्ती,दीपक,प्रसाद,फल,गंगाजल,पान,सुपारी,रूई,कपूर |
विधि- गणेश जी की मूर्ती सामने रखकर और श्रद्धा पूर्वक उस पर पुष्प छोड़े यदि मूर्ती न हो तो सुपारी पर मौली लपेटकर चावल पर स्थापित करें -
                                               
और आवाहन करें -
    गजाननं भूतगणादिसेवितम कपित्थजम्बू फल चारू भक्षणं |
    उमासुतम शोक विनाशकारकं नमामि विघ्नेश्वर पादपंकजम ||
    आगच्छ भगवन्देव स्थाने चात्र स्थिरो भव |
    यावत्पूजा करिष्यामि तावत्वं सन्निधौ भव ||


और अब प्रतिष्ठा (प्राण प्रतिष्ठा) करें -
   अस्यैप्राणाः प्रतिष्ठन्तु अस्यै प्राणा क्षरन्तु च |
   अस्यै देवत्वमर्चार्यम मामेहती च कश्चन ||
आसन-
   रम्यं सुशोभनं दिव्यं सर्व सौख्यंकर शुभम |
   आसनं च मया दत्तं गृहाण परमेश्वरः ||
पाद्य (पैर धुलना)-
     उष्णोदकं निर्मलं च सर्व सौगंध्य संयुत्तम |
     पादप्रक्षालनार्थाय दत्तं ते प्रतिगह्यताम ||
आर्घ्य(हाथ धुलना )-
     अर्घ्य गृहाण देवेश गंध पुष्पाक्षतै :|
     करुणाम कुरु में देव गृहणार्ध्य नमोस्तुते ||
आचमन -
     सर्वतीर्थ समायुक्तं सुगन्धि निर्मलं जलं |
     आचम्यताम मया दत्तं गृहीत्वा परमेश्वरः ||
स्नान -
     गंगा सरस्वती रेवा पयोष्णी नर्मदाजलै:|
     स्नापितोSसी मया देव तथा शांति कुरुश्वमे ||
दूध् से स्नान -
     कामधेनुसमुत्पन्नं सर्वेषां जीवन परम |
     पावनं यज्ञ हेतुश्च पयः स्नानार्थं समर्पितं ||
दही से स्नान-
    पयस्तु समुदभूतं मधुराम्लं शक्तिप्रभं |

    दध्यानीतं मया देव स्नानार्थं प्रतिगृह्यतां ||
घी से स्नान -
   नवनीत समुत्पन्नं सर्व संतोषकारकं |
   घृतं तुभ्यं प्रदास्यामि स्नानार्थं प्रतिगृह्यताम ||
शहद से स्नान-
   तरु पुष्प समुदभूतं सुस्वादु मधुरं मधुः |
   तेजः पुष्टिकरं दिव्यं स्नानार्थं प्रतिगृह्यताम ||
 शर्करा (चीनी) से स्नान -
     इक्षुसार समुदभूता शंकरा पुष्टिकार्कम |
     मलापहारिका दिव्या स्नानार्थं प्रतिगृह्यताम ||
पंचामृत से स्नान -
    पयोदधिघृतं चैव मधु च शर्करायुतं |

    पंचामृतं मयानीतं स्नानार्थं प्रतिगृह्यताम ||

शुध्दोदक (शुद्ध जल ) से स्नान -
    मंदाकिन्यास्त यध्दारि सर्वपापहरं शुभम |
    तदिधं कल्पितं देव स्नानार्थं प्रतिगृह्यताम ||
वस्त्र -
   सर्वभूषाधिके सौम्ये लोक लज्जा निवारणे |
   मयोपपादिते तुभ्यं वाससी प्रतिगृह्यतां ||
उपवस्त्र (कपडे का टुकड़ा )-
   सुजातो ज्योतिषा सह्शर्म वरुथमासदत्सव : |
    वासोअस्तेविश्वरूपवं संव्ययस्वविभावसो ||
यज्ञोपवीत -
    नवभिस्तन्तुभिर्युक्त त्रिगुण देवतामयम |
    उपवीतं मया दत्तं गृहाणं परमेश्वर : ||
मधुपर्क -
    कस्य कन्स्येनपिहितो दधिमध्वा ज्यसन्युतः |
    मधुपर्को मयानीतः पूजार्थ् प्रतिगृह्यतां ||
गन्ध -
    श्रीखण्डचन्दनं दिव्यँ गन्धाढयं सुमनोहरम |
    विलेपनं सुरश्रेष्ठ चन्दनं प्रतिगृह्यतां ||

रक्त(लाल )चन्दन-
    रक्त चन्दन समिश्रं पारिजातसमुदभवम |
    मया दत्तं गृहाणाश चन्दनं गन्धसंयुम ||
रोली -
    कुमकुम कामनादिव्यं कामनाकामसंभवाम |
    कुम्कुमेनार्चितो देव गृहाण परमेश्वर्: ||
सिन्दूर-
    सिन्दूरं शोभनं रक्तं सौभाग्यं सुखवर्धनम् ||
    शुभदं कामदं चैव सिन्दूरं प्रतिगृह्यतां ||
अक्षत -
     अक्षताश्च सुरश्रेष्ठं कुम्कुमाक्तः सुशोभितः |
     माया निवेदिता भक्त्या गृहाण परमेश्वरः ||
पुष्प-
     पुष्पैर्नांनाविधेर्दिव्यै: कुमुदैरथ चम्पकै: |
     पूजार्थ नीयते तुभ्यं पुष्पाणि प्रतिगृह्यतां ||
पुष्प माला -
      माल्यादीनि सुगन्धिनी मालत्यादीनि वै प्रभो |
       मयानीतानि पुष्पाणि गृहाण परमेश्वर: ||
बेल का पत्र -
     त्रिशाखैर्विल्वपत्रैश्च अच्छिद्रै: कोमलै :शुभै : |
      तव पूजां करिष्यामि गृहाण परमेश्वर : ||
 दूर्वा -
      त्वं दूर्वेSमृतजन्मानि वन्दितासि सुरैरपि |

      सौभाग्यं संततिं देहि सर्वकार्यकरो भव ||
 दूर्वाकर -
     दूर्वाकुरान सुहरिता नमृतान मंगलप्रदाम |
     आनीतांस्तव पूजार्थ गृहाण गणनायक:||
शमीपत्र -
   शमी शमय ये पापं शमी लाहित कष्टका |
   धारिण्यर्जुनवाणानां रामस्य प्रियवादिनी ||
अबीर गुलाल -
   अबीरं च गुलालं च चोवा चन्दन्मेव च |
   अबीरेणर्चितो देव क्षत: शान्ति प्रयच्छमे ||
आभूषण -
    अलंकारान्महा दव्यान्नानारत्न विनिर्मितान |

    गृहाण देवदेवेश प्रसीद परमेश्वर: ||
सुगंध तेल -
    चम्पकाशोक वकु ल मालती मीगरादिभि: |
    वासितं स्निग्धता हेतु तेलं चारु प्रगृह्यतां ||
धूप-
    वनस्पतिरसोदभूतो गन्धढयो गंध उत्तम : |
    आघ्रेय सर्वदेवानां धूपोSयं प्रतिगृह्यतां ||
दीप -
     आज्यं च वर्तिसंयुक्तं वहिन्ना योजितं मया |
     दीपं गृहाण देवेश त्रैलोक्यतिमिरापहम ||
नैवेद्य-
    शर्कराघृत संयुक्तं मधुरं स्वादुचोत्तमम |
    उपहार समायुक्तं नैवेद्यं प्रतिगृह्यतां ||
मध्येपानीय -
   अतितृप्तिकरं तोयं सुगन्धि च पिबेच्छ्या |

   त्वयि तृप्ते जगतृप्तं नित्यतृप्ते महात्मनि ||

ऋतुफल-

   नारिकेलफलं जम्बूफलं नारंगमुत्तमम |
   कुष्माण्डं पुरतो भक्त्या कल्पितं प्रतिगृह्यतां ||
आचमन -
   गंगाजलं समानीतां सुवर्णकलशे स्थितन |
   आचमम्यतां सुरश्रेष्ठ शुद्धमाचनीयकम ||
अखंड ऋतुफल -
    इदं फलं मयादेव स्थापितं पुरतस्तव |
    तेन मे सफलावाप्तिर्भवेज्जन्मनि जन्मनि ||
ताम्बूल पूंगीफलं -
    पूंगीफलम महद्दिश्यं नागवल्लीदलैर्युतम |
    एलादि चूर्णादि संयुक्तं ताम्बूलं प्रतिगृह्यतां ||
दक्षिणा(दान)-
    हिरण्यगर्भ गर्भस्थं हेमबीजं विभावसो: |
    अनन्तपुण्यफलदमत : शान्ति प्रयच्छ मे ||
आरती -
   चंद्रादित्यो च धरणी विद्युद्ग्निंस्तर्थव च |
    त्वमेव सर्वज्योतीष आर्तिक्यं प्रतिगृह्यताम ||
पुष्पांजलि -
    नानासुगन्धिपुष्पाणि यथाकालोदभवानि च |
    पुष्पांजलिर्मया दत्तो गृहाण परमेश्वर: ||
प्रार्थना-
    रक्ष रक्ष गणाध्यक्ष रक्ष त्रैलोक्य रक्षक:
    भक्तानामभयं कर्ता त्राता भव भवार्णवात ||
         अनया पूजया गणपति: प्रीयतां न मम ||
        श्री गणेश जी की आरती
जय गणेश,जय गणेश,जय गणेश देवा |
माता जाकी पारवती,पिता महादेवा ||
एक दन्त दयावंत,चार भुजा धारी |
मस्तक पर सिन्दूर सोहे,मूसे की सवारी || जय ...................................................
अंधन को आँख देत,कोढ़िन को काया |
बांझन को पुत्र देत,निर्धन को माया || जय ...................................................
हार चढ़े,फूल चढ़े और चढ़े मेवा |
लड्डुअन का भोग लगे,संत करें सेवा || जय ....................................................
दीनन की लाज राखो,शम्भु सुतवारी |

कामना को पूरा करो जग बलिहारी || जय 

---------------------------------------------------------------------

 गणेश नामवली-108

 भाद्रपद माह की चतुर्थी को मनाया जाने वाला गणेश चतुर्थी का त्योहार पूरे भारत में जोर-शोर से मनाया जाता है। हर भक्तगण अपने-अपने तरीके से भगवान गणेश के जन्मदिन को मनाता है। महाराष्ट्र में गणेश चतुर्थी से लेकर अनंत चतुर्दशी तक गणेशोत्सव मनाया जाता है। पूरा देश मंगलमूर्ति भगवान गणेश को अपने घर लाने के तैयारियों बड़े जोर-शोर से करता है। कहते हैं कि इस दिन भगवान गणेश धरती पर आते हैं और अपने भक्तों के कष्टों को हर लेते हैं। बुद्धिदाता, विघ्नहर्ता  जैसे 108 नाम वाले भगवान गणेश के हर एक नाम में अपने भक्तों का उद्धार छुपा हुआ है।
आधुनिक समय में अधिकतर हर व्यक्ति किसी ना किसी परेशानी से परेशान रहता है। इस परेशानी को बहुत हद तक कम किया जा सकता है यदि रोज सुबह के समय गणेश जी के 108 नाम लिए जाएँ। गणेश जी को वैसे भी विघ्नहर्त्ता कहा गया है। गणेश जी के 108 नाम इस प्रकार हैं:-
गणेश नामवली-108

1. बालगणपति: सबसे प्रिय बालक
2. भालचन्द्र: जिसके मस्तक पर चंद्रमा हो
3. बुद्धिनाथ: बुद्धि के भगवान
4. धूम्रवर्ण: धुंए को उड़ाने वाला
5. एकाक्षर: एकल अक्षर
6. एकदन्त: एक दांत वाले
7. गजकर्ण: हाथी की तरह आंखें वाला
8. गजानन: हाथी के मुँख वाले भगवान
9. गजनान: हाथी के मुख वाले भगवान
10. गजवक्र: हाथी की सूंड वाला
11. गजवक्त्र: जिसका हाथी की तरह मुँह है
12. गणाध्यक्ष: सभी जणों का मालिक
13. गणपति: सभी गणों के मालिक
14. गौरीसुत: माता गौरी का बेटा
15. लम्बकर्ण: बड़े कान वाले देव
16. लम्बोदर: बड़े पेट वाले
17. महाबल: अत्यधिक बलशाली वाले प्रभु
18. महागणपति: देवातिदेव
19. महेश्वर: सारे ब्रह्मांड के भगवान
20. मंगलमूर्त्ति: सभी शुभ कार्य के देव
21. मूषकवाहन: जिसका सारथी मूषक है
22. निदीश्वरम: धन और निधि के दाता
23. प्रथमेश्वर: सब के बीच प्रथम आने वाला
24. शूपकर्ण: बड़े कान वाले देव
25. शुभम: सभी शुभ कार्यों के प्रभु
26. सिद्धिदाता: इच्छाओं और अवसरों के स्वामी
27. सिद्दिविनायक: सफलता के स्वामी
28. सुरेश्वरम: देवों के देव
29. वक्रतुण्ड: घुमावदार सूंड
30. अखूरथ: जिसका सारथी मूषक है
31. अलम्पता: अनन्त देव
32. अमित: अतुलनीय प्रभु
33. अनन्तचिदरुपम: अनंत और व्यक्ति चेतना
34. अवनीश: पूरे विश्व के प्रभु
35. अविघ्न: बाधाओं को हरने वाले
36. भीम: विशाल
37. भूपति: धरती के मालिक
38. भुवनपति: देवों के देव
39. बुद्धिप्रिय: ज्ञान के दाता
40. बुद्धिविधाता: बुद्धि के मालिक
41. चतुर्भुज: चार भुजाओं वाले
42. देवादेव: सभी भगवान में सर्वोपरी
43. देवांतकनाशकारी: बुराइयों और असुरों के विनाशक
44. देवव्रत: सबकी तपस्या स्वीकार करने वाले
45. देवेन्द्राशिक: सभी देवताओं की रक्षा करने वाले
46. धार्मिक: दान देने वाला
47. दूर्जा: अपराजित देव
48. द्वैमातुर: दो माताओं वाले
49. एकदंष्ट्र: एक दांत वाले
50. ईशानपुत्र: भगवान शिव के बेटे
51. गदाधर: जिसका हथियार गदा है
52. गणाध्यक्षिण: सभी पिंडों के नेता
53. गुणिन: जो सभी गुणों क ज्ञानी
54. हरिद्र: स्वर्ण के रंग वाला
55. हेरम्ब: माँ का प्रिय पुत्र
56. कपिल: पीले भूरे रंग वाला
57. कवीश: कवियों के स्वामी
58. कीर्त्ति: यश के स्वामी
59. कृपाकर: कृपा करने वाले
60. कृष्णपिंगाश: पीली भूरी आंखवाले
61. क्षेमंकरी: माफी प्रदान करने वाला
62. क्षिप्रा: आराधना के योग्य
63. मनोमय: दिल जीतने वाले
64. मृत्युंजय: मौत को हरने वाले
65. मूढ़ाकरम: जिन्में खुशी का वास होता है
66. मुक्तिदायी: शाश्वत आनंद के दाता
67. नादप्रतिष्ठित: जिसे संगीत से प्यार हो
68. नमस्थेतु:  सभी बुराइयों और पापों पर विजय प्राप्त करने वाले
69. नन्दन: भगवान शिव का बेटा
70. सिद्धांथ:  सफलता और उपलब्धियों की गुरु
71. पीताम्बर: पीले वस्त्र धारण करने वाला
72. प्रमोद: आनंद
73. पुरुष: अद्भुत व्यक्तित्व
74. रक्त: लाल रंग के शरीर वाला
75. रुद्रप्रिय: भगवान शिव के चहीते
76. सर्वदेवात्मन: सभी स्वर्गीय प्रसाद के स्वीकार्ता
77. सर्वसिद्धांत: कौशल और बुद्धि के दाता
78. सर्वात्मन: ब्रह्मांड की रक्षा करने वाला
79. ओमकार: ओम के आकार वाला
80. शशिवर्णम: जिसका रंग चंद्रमा को भाता हो
81. शुभगुणकानन: जो सभी गुण के गुरु हैं
82. श्वेता: जो सफेद रंग के रूप में शुद्ध है
83. सिद्धिप्रिय: इच्छापूर्ति वाले
84. स्कन्दपूर्वज: भगवान कार्तिकेय के भाई
85. सुमुख: शुभ मुख वाले
86. स्वरुप: सौंदर्य के प्रेमी
87. तरुण: जिसकी कोई आयु न हो
88. उद्दण्ड: शरारती
89. उमापुत्र: पार्वती के बेटे
90. वरगणपति: अवसरों के स्वामी
91. वरप्रद: इच्छाओं और अवसरों के अनुदाता
92. वरदविनायक: सफलता के स्वामी
93. वीरगणपति: वीर प्रभु
94. विद्यावारिधि: बुद्धि की देव
95. विघ्नहर: बाधाओं को दूर करने वाले
96. विघ्नहर्त्ता: बुद्धि की देव
97. विघ्नविनाशन: बाधाओं का अंत करने वाले
98. विघ्नराज: सभी बाधाओं के मालिक
99. विघ्नराजेन्द्र: सभी बाधाओं के भगवान
100. विघ्नविनाशाय: सभी बाधाओं का नाश करने वाला
101. विघ्नेश्वर: सभी बाधाओं के हरने वाले भगवान
102. विकट: अत्यंत विशाल
103. विनायक: सब का भगवान
104. विश्वमुख:  ब्रह्मांड के गुरु
105. विश्वराजा: संसार के स्वामी
105. यज्ञकाय:  सभी पवित्र और बलि को स्वीकार करने वाला
106. यशस्कर:  प्रसिद्धि और भाग्य के स्वामी
107. यशस्विन: सबसे प्यारे और लोकप्रिय देव
108. योगाधिप: ध्यान के प्रभु

 

 भगवान श्रीकृष्ण जन्माष्टमी : कैसे करें सरल पूजन
Krishn_bhagwan
भगवान श्रीकृष्ण का जन्म अष्टमी तिथि, रोहिणी नक्षत्र, वृषभ राशि, भाद्रपद कृष्ण अष्टमी, बुधवार, रोहिणी नक्षत्र एवं वृष के चन्द्रमाकालीन अर्धरात्रि के समय हुआ था।
ऋषियों के मतानुसार सप्तमी युक्त अष्टमी ही व्रत, पूजन आदि हेतु ग्रहण करनी चाहिए। वैष्णव संप्रदाय के अधिकांश लोग उदयकालिक नवमी युत श्रीकृष्ण जन्माष्टमी को ग्रहण करते हैं।
भगवान श्रीकृष्ण का जन्मदिन बडे़ ही धूमधाम से मनाया जाता है।
इस दिन व्रत करनेवाले को चाहिए कि उपवास के पहले दिन कम भोजन करें। रात्रि में ब्रह्मचर्य का पालन करें।
व्रत के दिन स्नानादि नित्यकर्म करके सूर्यादि सभी देव दिशाओं को नमस्कार करके पूर्व या उत्तर मुख बैठें।
भगवान श्रीकृष्‍ण को वैजयंती के पुष्प अधिक प्रिय है, अतः जहां तक बन पडे़ वैजयंती के पुष्प अर्पित करें और पंचगंध लेकर व्रत का संकल्प करें।
कृष्णजी की मूर्ति को गंगा जल से स्नान कराएं। फिर दूध, दही, घी, शक्कर, शहद, केसर के घोल से स्नान कराकर फिर शुद्ध जल से स्नान कराएं। फिर सुन्दर वस्त्र पहनाएं। रात्रि बारह बजे भोग लगाकर पूजन करें व फिर श्रीकृष्णजी की आरती उतारें।


कैसे मनाएं कृष्‍ण जन्माष्टमी पर्व
Webdunia
भारतीय पौराणिक ग्रंथों के अनुसार कृष्ण सभी दृष्टि से पूर्णावतार हैं। आध्यात्मिक, नैतिक या दूसरी किसी भी दृष्टि से देखेंगे तो मालूम होगा कि कृष्ण जैसा समाज उद्धारक दूसरा कोई पैदा हुआ ही नहीं है।
जब-जब भी धर्म का पतन हुआ है और धरती पर असुरों के अत्याचार बढ़े हैं तब-तब भगवान ने पृथ्वी पर अवतार लेकर सत्य और धर्म की स्थापना की है। भाद्रपद माह की कृष्ण पक्ष की अष्टमी की मध्यरात्रि को अत्याचारी कंस का विनाश करने के लिए मथुरा में भगवान श्रीकृष्ण ने अवतार लिया था।
ऐसे भगवान कृष्‍ण के व्रत-पूजन से संबंधित जानकारी प्रस्तुत है :-
व्रत-पूजन कैसे करें :
- उपवास की पूर्व रात्रि को हल्का भोजन करें और ब्रह्मचर्य का पालन करें।
- उपवास के दिन प्रातःकाल स्नानादि नित्यकर्मों से निवृत्त हो जाएं। पश्चात सूर्य, सोम, यम, काल, संधि, भूत, पवन, दिक्‌पति, भूमि, आकाश, खेचर, अमर और ब्रह्मादि को नमस्कार कर पूर्व या उत्तर मुख बैठें।
- इसके बाद जल, फल, कुश और गंध लेकर संकल्प करें :
ममखिलपापप्रशमनपूर्वक सर्वाभीष्ट सिद्धये
श्रीकृष्ण जन्माष्टमी व्रतमहं करिष्ये॥
अब मध्याह्न के समय काले तिलों के जल से स्नान कर देवकीजी के लिए 'सूतिकागृह' नियत करें।
- तत्पश्चात भगवान श्रीकृष्ण की मूर्ति या चित्र स्थापित करें।
- मूर्ति में बालक श्रीकृष्ण को स्तनपान कराती हुई देवकी हों और लक्ष्मीजी उनके चरण स्पर्श किए हों अथवा ऐसे भाव हो।
- इसके बाद विधि-विधान से पूजन करें।
पूजन में देवकी, वासुदेव, बलदेव, नंद, यशोदा और लक्ष्मी इन सबका नाम क्रमशः निर्दिष्ट करना चाहिए।
फिर निम्न मंत्र से पुष्पांजलि अर्पण करें :-
'प्रणमे देव जननी त्वया जातस्तु वामनः।
वसुदेवात तथा कृष्णो नमस्तुभ्यं नमो नमः।
सुपुत्रार्घ्यं प्रदत्तं में गृहाणेमं नमोऽस्तुते।'
अंत में रतजगा रखकर भजन-कीर्तन करें। साथ ही प्रसाद वितरण करके कृष्‍ण जन्माष्टमी पर्व मनाएं। 

 इस वर्ष 17 अगस्त, रविवार एवं 18 अगस्त, सोमवार को श्रीकृष्ण जन्माष्टमी मनाई जाएगी। 17 अगस्त को सूर्य संक्रांति (सूर्य का सिंह राशि में प्रवेश) तथा 18 अगस्त को रोहिणी नक्षत्र होने से दोनों दिनों का महत्व है। सकाम मंत्रों का प्रयोग निम्नलिखित है : -
(1) यदि कोई बड़ी आपदा हो और कोई मार्ग न मिल रहा हो तो यथाशक्ति निम्न मंत्र का जाप करें : -
मंत्र - 'श्रीकृष्ण:शरणं मम्।'
(2) शांति तथा मोक्ष पाने के लिए निम्न मंत्र है -
मंत्र - 'ॐ हृषिकेशाय नम:'।
(3) शत्रु शांति के लिए -
मंत्र - 'क्लीं हृषिकेशाय नम:'।
(4) मोक्ष पाने के लिए तथा भक्ति वैराग्य के लिए -
मंत्र - 'ॐ नमो भगवते वासुदेवाय'।
(5) सौभाग्य वृद्धि तथा ऐश्वर्य प्राप्ति तथा क्लेश निवारण के लिए निम्न मंत्र जपें -
मंत्र - 'ॐ ऐं श्री क्लीं प्राण वल्लभाय सौ: सौभाग्यदाय श्री कृष्णाय स्वाहा'।
(6) संतान प्राप्ति के लिए सबसे ज्यादा प्रचलित तथा अमोघ मंत्र निम्न है -
मंत्र - 'ॐ देवकीसुत गोविन्द वासुदेव जगत्पते'।
देहि में तनयं कृष्ण त्वामहं शरणं गत:।।'
(7) निम्न मंत्र कल्पतरु के समान है। जिसका मानसिक जाप हमेशा कर सकते हैं।
मंत्र - 'ॐ नमो नारायणाय'
(8) कैसी भी समस्या को दूर करने हेतु निम्न पाठ किया जाता है।
मंत्र - गजेन्द्र मोक्ष के 108 पाठ।
* राम, कृष्ण, विष्णु के मंत्र का जाप तुलसी की माला से ही करें तथा पीला या लाल आसन मोक्ष के लिए कुश-आसन का प्रयोग कर सकते हैं।
* पूर्वाभिमुख या उत्तराभिमुख होकर सामने भगवान का चित्र, घी का दीपक, धूप तथा नैवेद्यादि लगाकर जप करें। इति:।

Friday, August 2, 2013

ज्‍योतिष और रिश्ते /Astrology Simplified/ Astrology and relation :Astrology Simplified video:


http://youtu.be/l6cn0eG23Xw 
Astrology Simplified Videos : By H L CHOUREY
 
ज्योतिष सरलीकृत-ज्‍योतिष और रिश्ते / जानें ग्रह कब देते हैं अशुभ फल?Astrology and relation /planets evil fruit?
ग्रहों के अशुभ फल— 
चंद्र : , माता, नानी, दादी, सास एवं इनके पद के समान वाली स्त्रियों को कष्ट देने  चंद्रमा अशुभ फल देता है। 

बुध : अपनी बहन अथवा बेटी  बुआसाली एवं मौसी को कष्ट देने से बुध अशुभ फल देता है।
गुरु : अपने पिता, दादा, नाना इनके समान सम्मानित व्यक्ति  साधु संतों को कष्ट देने से गुरु अशुभ फल देता है। 

शुक्र : अपने जीवनसाथी को कष्ट देने, -अशुभ फल देता है।
मंगल : भाई अपनी पत्नी के भाई (साले)  अशुभ फल देता है।
शनि : ताऊ एवं चाचा  अशुभ फल देते हैं। राहु :  बड़े भाई  ननिहाल पक्ष वालों का अपमान करने से राहु अशुभ फल देता है। 
केतु : भतीजे एवं भांजे  अशुभ फल देना है। 



ज्योतिष,वास्तु ,एक्यूप्रेशर पॉइंट्स ,हेल्थ , इन सबकी डेली टिप्स के लिए-:
फेसबुक पर जुड़ने के लिए यहां क्लिक करें एवं पेज पर लाइक बटन दबाएं
निवेदन  :- अगर आपको दी गई जानकारी अच्छी लगे तो कृपया शेयर करें और अपने मित्रों को भी लाइक करने के लिए कहै .
धन्यवाद।
 You Tube :click link:Astrology Simplified By Housi Lal Chourey https://www.youtube.com/channel/UChJUKgqHqQQfOeYWgIhMZMQ
  Astrology, Numerology, Palmistry & Vastu Consultant : Mob No. 08861209966,
 मुझे ईमेल करें ; ID : housi.chourey@gmail.com  .
लिंक को क्लिक  करके  लाइक करें,------
 https://www.youtube.com/channel /UChJUKgqHqQQfOeYWgIhMZMQ

ज्योतिष और आहार / Astrology Simplified/ Diet and Astrology :Astrology Simplified video:

 ज्योतिष सरलीकृत/ज्योतिष और आहार  / Astrology Simplified/  Diet and Astrology
http://www.youtube.com/watch?v=aP9ZK4S73Dk
 Astrology Simplified Videos : By H L CHOUREY

Thursday, August 1, 2013

बच्चे का मूल स्वभाव जानकर परवरिस करेAstrology Simplified/, -The basic nature of child.:Astrology Simplified video:

Astrology Simplified ज्योतिष सरलीकृत / बच्चे का मूल स्वभाव जानकर परवरिस करे/Learn Astrology, -The basic nature of child.
 Astrology Simplified Videos : By H L CHOUREY
सूर्य जिद्दी व क्रोधी बनाता है। मंगल झगड़ालु व अति साहसी बनाता है। बुध कुशाग्र बुद्धि का, अति वाचाल बनाता है। चन्द्रमा भावुक व डरपोक बनाता है। शुक्र कलात्मक अभिरुचि देता है। शनि आलसी, । केतु लक्ष्यहीन, उदासीन वृत्ति देता है। राहु उग्रता, झूठ बोलना
http://www.youtube.com/watch?v=G2ZkJvnholw

इष्ट देव की उपासना/ Astrology Simplified/Deity worship :Astrology Simplified video:

  Astrology Simplified ज्योतिष सरलीकृत /    इष्ट देव की उपासना/Deity worship 
Astrology Simplified Videos : By H L CHOUREY

नीचे सभी राशियों के देवता दिए जा रहे हैं। अपनी राशि के अनुसार देवता की आराधना करे
मेष : हनुमान जी
वृषभ : दुर्गा माँ
मिथुन : गणपति जी
कर्क: शिव जी
सिंह : विष्णु जी (श्रीराम )
कन्या : गणेश जी
तुला : देवी माँ
वृश्चिक : हनुमान जी
धनु : विष्णु जी
मकर : शिव जी
कुम्भ : शिव का रूद्र रूप
मीन : विष्णु जी (सत्यनारायण भगवान)
प्रतिनिधि ग्रह-- इष्‍ट देव---- रत्न दान -----सामग्री
गुरु--------------- विष्‍णु-----पुखराज- ---पीली वस्तुएँ
शुक्र------------- देवी के रूप--- हीरा -----सफेद मिठाई
शनि------------- शिव जी----- नीलम ----काली वस्तुएँ
सूर्य--------- गायत्री, विष्णु---- माणिक--- सफेद वस्तुएँ, नारंगी
बुध------------- गणेश-------- पन्ना-------- हरी वस्तु
मंगल ---------हनुमानजी ------मूँगा------- लाल वस्तुएँ
चंद्र------------- शिवजी-------- मोती------- सफेद वस्तु
जन्म माह : जिन्हें केवल जन्म का माह ज्ञात है, उनके लिए इष्ट देव इस प्रकार होंगे-
-जिनका जन्म जनवरी या नवंबर माह में हुआ हो वे शिव या गणेश की पूजा करें।
-फरवरी में जन्मे शिव की उपासना करें।
-मार्च व दिसंबर में जन्मे व्यक्ति विष्णु की साधना करें।
-अप्रेल, सितंबर, अक्टूबर में जन्मे व्यक्ति गणेशजी की पूजा करें।
-मई व जून माह में जन्मे व्यक्ति मां भगवती की पूजा करें।
-जुलाई माह में जन्मे व्यक्ति विष्णु व गणेश का घ्यान करें।
जन्म वार से : जिनको वार का पता हो, परंतु समय का पता न हो, तो वार के अनुसार इष्ट देव इस प्रकार होंगे-
रविवार- विष्णु सोमवार- शिवजी। मंगलवार- हनुमानजी बुधवार- गणेशजी गुरूवार- शिवजी शुक्रवार- देवी
शनिवार- भैरवजी।
विशेष : संबंधित राशि के रत्न पहनने से और जप दान करने से अनुकूल फल प्राप्त होते हैं।
अगर आप किसी तीर्थ-स्थल पर जाकर पूजा-पाठ या दान-दक्षिणा करते हुए पुण्य कमाना चाहते हैं,

ज्योतिष परिचय /Astrology Simplified / Jyotish Introduction :Astrology Simplified video:


ज्योतिष सरलीकृत /ज्योतिष परिचय /Astrology Simplified / Jyotish Introduction
Astrology Simplified Videos : By H L CHOUREY 

Friday, July 5, 2013

अंक ज्योतिष - मूलांक और आपका भविष्य :Numerology - Mulank and Your Future:

जानिये मूलांक के बारे में ..

(1.) जिसका जन्म 1,10,19,28 को हुआ हो, उसका मूलांक एक होता है।  गुस्सा जल्दी आता है।
 (2.) जिसका जन्म 2,11,20, 29 को होता है, उसका मूलांक दो होता है।  ये चंचल स्वभाव के होते हैं, स्थिर नहीं रहते । इनका मन एक स्थान पर स्थिर नहीं रहता।
(3.) जिसका जन्म 3,12,21,30 को होता है, उसका मूलांक तीन होता है। ज्ञानी और स्पष्टवादी होते हैं। कला के प्रति रुझान होता है।
(4.) जिसका जन्म 4,13,22,31 को होता है, उसका मूलांक चार होता है। ये लोग मेहनती  होते हैं। अनुशासनप्रिय होते हैं ,एक जगह शान्त नहीं बैठते।
(5.) जिसका जन्म 5,14,23 को होता है, उसका मूलांक पाँच होता है। मिल-जुलकर रहना पसन्द करते हैं।
(6.) जिसका जन्म 6,15,24 को होता है, उसका मूलांक छः होता है। इनकी सौन्दर्य के प्रति रुचि होती हैं।
(7.) जिसका जन्म 7,16,25 को होता है, उसका मूलांक सात होता है।  धोखों का सामना करना पडता है। ये स्वभाव से मिलनसार ,अच्छे होते हैं।
(8.) जिसका जन्म 8,17,26 को होता है, उसका मूलांक आठ होता है।  लोग रहस्मयवादी प्रवृत्ति।

 (9.) जिसका जन्म 9,18,27 को होता है, उसका मूलांक नौ होता है। बहुत जल्दी उत्तेजित भी हो जाते हैं।

मूलांक से चुनिए करियर —-

मूलांक यानी आपकी डेट ऑफ बर्थ या जन्मदिन। यदि होरोस्कोप न हो तो केवल इसके द्वारा भी आप अपनी वर्किंग फील्ड के बारे में जान सकते है और मनचाही सफलता हासिल कर सकते हैं।

* यदि आप मूलांक 1 को रिप्रेजेंट करते है तो आपको डिजाइनर, टीम लीडर, फिल्म मेकिंग या नवीन इन्वेंशन के क्षेत्र में जाना चाहिए।

* यदि आपका मूलांक 2 है तो आपको किसी भी रचनात्मक काम को करना चाहिए जैसे डाँसिंग, राइटिंग, पोएट्री या रिसर्च के कार्य कर सकते हैं।


मूलांक 3 है तो आपके लिए एक्टिंग, टीचिंग, जर्नलिज्म, काउंसलिंग आदि बेहतर ऑप्शन है।

 मूलांक 4 है तो आपको इंजीनियर, बिल्डर, प्रोग्रामर, मशीनों से रिलेटेड काम करना चाहिए।

 मूलांक 5 है तो आपको प्रकाशन, विज्ञापन,लेखन आदि क्षेत्र में काम करना चाहिए।

 मूलांक 6 को रिप्रेजेंट करते है तो आप सोशल वर्क, मेडिकल, आयुर्वेद,कुकिंग आदि फील्ड में काम कर सकते हैं।

मूलांक 7 है तो आपको वैज्ञानिक, दार्शनिक, जासूस, मिस्ट्री नॉवेल राइटर होना चाहिए।

मूलांक 8 है तो आपको बैंकिंग, मैनेजर, किसी संस्था का डायरेक्टर या मशीनों का काम करना चाहिए।

मूलांक 9 है तो आप खिलाड़ी, फिजिशियन, वकील,सैनिक आदि हो सकते हैं।

मूलांक और आपका भविष्य
 मूलांक 1
महीने की 1, 10, 19, 28 तारीख को होता है, उसका मूलांक 1 होगा।  अधिपति सूर्य है।  दृढ़निश्चयी, स्वतंत्रता प्रिय, तथा नेतृत्व की जन्मजात प्रतिभा वाले होते हैं। ये बड़े परिश्रमी, लग्नशील, स्वाभिमानी तथा शक्तिशाली होते हैं।

 मूलांक 2
महीने की 2, 11, 20, 29 तारीख को पैदा होने वाले जातक का मूलांक 2 होगा।  मूलांक 2 वाले व्यक्ति अपनत्व और प्यार के साथ अपनाते है और उन्हें प्रगति के पथ की ओर अग्रसर करने में प्रेरणादायी भूमिका का निर्वाहन करते हैं। रोग और मूलांक 2 : कमजोरी, क्षीणता, उद्वेग, मस्तक पीड़ा, छोटी-छोटी दुर्घटना, हृदय रोग, संवेदनशीलता, भावुकता, स्नायु निर्बलता, कब्जियत, आंत रोग, मूत्र रोग, गैस रोग  हो सकते हैं। हृदय रोग, मधुमेह, जोड़ों के दर्द आदि . महत्वपूर्ण वर्ष : 2, 11, 19, 20, 29, 37, 47, 57, 61 एवं 71 वां वर्ष शुभ हो ,मूलांक के जातकों के लिए 1, 4 और 7 की संख्या भी शुभ है।
मूलांक 3
मूलांक 3 वाले व्यक्ति महत्वाकांक्ष, नेतृत्व प्रिय, अधीनस्थ लोगों से भी अनुशासन में कठोर होते हैं।  मूलांक भी 3 हो तो उन जातकों पर वृहस्पति शुभ प्रभाव होगा। देव गुरू वृहस्पति -धन, विद्या, मन्त्रणा और सन्तान के कारक माने गये हैं।  3, 12, 21, 30 इन सब अंकों का मूलांक 3 ही हैं। जिनकी जन्म तारीख का मूलांक 3 हो, उनमें परस्पर विशेष आकर्षण होता है। मूलांक 3 अंक वालों को चमकीला गुलाबी रंग या हल्का गुलाबी रंग विशेष शुभ होता है। रोग और मूलांक :  चर्मरोग , दाद, खाज, खुजली, प्रमेह, पित्त प्रकोप, रक्त दोष  शुभ वार - रविवार, मंगलवार, गुरूवार एवं शुक्रवार। शुभ तारीखें - 3, 12, 21, 30, 6, 15, 24, 9, 18, 27, 1, 10, 19, 28 , महत्वपूर्ण वर्ष - 3, 6, 9, 12, 15, 18, 21, 24, 27, 30, 33, 39, 42, 45, 48, 51, 54, 57, 60, 63, 66 इत्यादि।

 मूलांक 4 वाला व्यक्ति अपने विवेक द्वारा अपनी कल्पना को सही दिशा देता है मूलांक 4 वाले व्यक्ति नई व्यवस्थाओं के संस्थापक एवं पुरानी सामाजिक व्यवस्थाओं के विरोधी होते हैं।  जिन लोगों की जन्म तारीख का मूलांक 1, 2, 7 या 8 होता है, उसके प्रति इनका झुकाव हो सकता है। मूलांक 4 अर्थात जन्म तारीख, 4, 13, 22, 31 हो उन्हें धन का अपव्यय नहीं करना चाहिए,  मूलांक 4 वाले व्यक्ति अपने अन्दर सहनशीलता की भावना पैदा करें और दूसरों से व्यर्थ विवाद न करें तथा शुत्रता को दावतनामा न दें,  शुभ वार - रविवार, सोमवार, शनिवार भी शुभ है। शुभ तारीखें - 4, 13, 22, 31 साथ ही 1, 10, 19, 28 शुभ रंग - क्रीम कलर, भूरा मिश्रित खाकी, नीला चटकीला रंग। जीवन के महत्वपूर्ण वर्ष - 4, 13, 22, 31, 40, 49, 58, 67, 76 आदि।

  मूलांक 5
   स्वस्थ्य शरीर, सदृढ़ कद काठी, तर्क बुद्धि, विलक्षण सूझबूझ के धनी, बुद्धि ज्ञान से सम्पन्न, पाण्डित्य दर्शाता स्वभाव, तेज तर्रार आभापूर्ण व्यक्तित्व इनकी प्रमुख विशेषता होती है। रोग और मूलांक 5 :  आंत संबंधी, चर्म रोग, जुकाम, नजला, फेफड़े या स्नायु रोग। मूलांक 5 वालों पर बुध का प्रभाव विशेष रूप से पड़ता है।  जीवन के महत्वपूर्ण वर्ष : 5, 14, 23, 32, 41, 50, 59, 68 तथा 77 वाँ वर्ष महत्वपूर्ण होता है।  32 वें वर्ष में बुध अपना पूर्ण प्रभाव दिखाने लगता है।
  शुभवार - बुधवार, रविवार, शुक्रवार। शुभ तारीखें - 5, 14, 23 इन तारीखों में बुधवार हो तो विशेष शुभ। 1, 10, 19, 28 इन तारीखों में रविवार हो तो विशेष शुभ। शुभ रंग - हरा, श्वेत, भूरा, कत्थई। शुभ दिशा - उत्तर पूर्व एवं उत्तर पश्चिम।

  मूलांक 6
  स्वामी ग्रह शुक्र है।  6, 15 या 24 तारीख को हुआ हो। 6 मूलांक वाले व्यक्ति बहुधा लोकप्रिय होते हैं। इनमें आकर्षण शक्ति और मिलानसरिता प्रचुर मात्रा में होती है। धनी होने पर मूलांक 6 वाले व्यक्ति कला और कलाकारों के लिए उदारता से धन खर्च करते हैं।जीवन के महत्वपूर्ण वर्ष - 6, 15, 24, 33, 42, 51, 60 69 वां वर्ष महत्वपूर्ण है। रोग और मूलांक :  फेफड़ों से संबंधित रोग, स्नायु दुर्बलता, सीने की कमजोरी, मूत्र रोग, कफ जनित रोग, कब्जियत व जुकाम जैसे रोगो से पीडि़त हो सकते हैं। शुभवार - मंगलवार, गुरुवार एवं शुक्रवार शुभ तारीखें - 6, 15, 24 सहयोगी तारीखें 3, 9, 12, 18, 21, 27 एवं 30 शुभ रंग - गहरा नीला रंग, गुलाबी रंग, अशुभ रंग काला और बैगनी। शुभ दिशा - उत्तर पूर्व अथवा उत्तर पश्चिम शुभ रत्न - सौभाग्यशाली रत्न फिरोजा, पन्ना।

  मूलांक 7
मूलांक 7 के व्यक्तियों का प्रतीक और स्वामी ग्रह नेपच्यून यानी वरूण है।  7, 16, 25 को जन्मा हो, उसका मूलांक 7 होता है। 7 अंक वाले व्यक्तियों के लिये चन्द्रमा से संबंध रखने वाले 2, 11, 20, 29 तारीखों में पैदा हुए व्यक्तियों से दोस्ती करना शुभ रहेगा।  7, 16, 25 तारीख को पैदा हुए व्यक्ति स्वतंत्र और मौलिक विचार वाले होते हैं। मूलांक 7 वाले व्यक्ति धर्म के संबंध में अपने विशिष्ट विचार रखते हैं। वे पुरानी परम्पराओं को पसन्द नहीं करते।  पहला गुण- मौलिकता, दूसरा गुण - स्वतंत्र विचार और तीसरा प्रधान गुण : विशाल व्यक्तित्व। जीवन के महत्वपूर्ण वर्ष - 7, 16, 25, 34, 43, 52 और 61 वां वर्ष आपके जीवन में महत्वपूर्ण होगें। इन वर्षों में आप अवश्य सफलता प्राप्त करेंगे। मित्रांक वर्ष 2, 4, 11, 13, 20, 22, 29, 31, 38, 40, 47, 49, 58 एवं 67 वां वर्ष भी लाभकारी हो सकता है। रोग और मूलांक : जब भी आपके जीवन में रोग की स्थिति आयेगी तब आपको पेट दर्द, छूत के रोग, पसीने की अधिकता, आमाशय दोष, कब्जियत, नींद न आना, भूख न लगना, गुप्तांग संबंधी रोग, वात व गठिया इत्यादि रोग हो सकते हैं। शुभवार - रविवार, सोमवार और बुधवार, शुभ तारीखें - 7, 16, 25, एवं 2, 11, 20 एवं 29, शुभ रंग - हल्का नीला, आसमानी, कपूरी, हरा, श्वेत, गुलाबी
अंक ज्योतिष में मूलांक 8 को विश्वास का अंक कहा गया है। इसका स्वामी ग्रह शनि है। किसी भी माह की 8, 17, 26 तारीख का मूलांक 8 होता है।
रोग और मूलांक :  वायु रोग, वात रोग, शारीरिक क्षीणता, अंध रोग, हृदय की कमजोरी, रक्त की कमी, कब्जियत, रक्तचाप, सिर की पीड़ा, कुष्ठ रोग, मूत्र रोग, गंजापन तथा कान-नाक में पीड़ा हो सकती है।जीवन के महत्वपूर्ण वर्ष - 8, 17, 26, 35, 44, 53, 62, 71 आदि वर्ष शुभ हैं इन आयु वर्षों में जीवन की अनुकूलता रह सकती हैं। मित्रांक वर्ष 4, 13, 22, 31, 40, 49 भी शुभ हो सकते हैं। शुभवार - शनिवार एवं बुधवार। शुभ तारीखें - 8,17, 26। शुभ रंग - गहरा नीला, काला, हरा एवं भूरा मिश्रित बैंगनी। शुभ दिशा - दक्षिण, दक्षिण पूर्व एवं दक्षिण पश्चिम।

मूलांक 9
मूलांक 9 का प्रतीक और स्वामी ग्रह मंगल है। 9, 18 या 27 तारीख को पैदा हुए हों।


 रोग और मूलांक: जब भी आपके जीवन में रोग की स्थिति आयेगी तब आपको क्रोध, झल्लाहट दुर्घटना, चोट, अंग शैथिल्य, हृदयरोग, रक्तचाप आदि पीड़ा देंगे।
  जीवन के महत्वपूर्ण वर्ष - 9, 18, 27, 36, 45, 54, 63, 72, 81 आदि। शुभवार - मंगलवार, गुरूवार एवं शुक्रवार। शुभ रंग - गुलाबी, गहरा लाल, सफेद या पीला। शुभ दिशा - पूर्व, उत्तर पूर्व, उत्तर पश्चिम। । मनुष्य का प्रतिनिधित्व करने वाला 9 का अंक शारीरिक और भौतिक क्षेत्र में शक्ति, ऊर्जा और युद्ध में संहार के गुणों से युक्त माना गया है।

अंक ज्योतिष में सभी अंको की अलग-अलग औषधियां और वनस्पतियां बताई गई है।  वनस्पतियों का उपयोग करें।
अंक-1  लौंग, केसर, किशमिश, कालीमिर्च, अदरक, आजवाइन, सौंठ, नींबू, जायफल, जौ, खजूर, संतरा, सीताफ ल आदि औषधियां उपयोग करना चाहिए इनके उपयोग से आप हमेशा तरोताजा रहेंगे।
अंक-2  केला, ककड़ी, कलींदा, पत्ता गोभी, सिंघाड़ा, सलाद आदि चिजों का सेवन करना आपके लिए लाभकारी माना गया है।
अंक-3 अनार, अंगूर, अनानास, शहतूत, सेब, शतावरी, नाशपाती, पुदीना, बादाम, केशर, लौंग, अंजीर एवं चुकंदर, स्वास्थ्य रक्षक जड़ी बूटियों का सेवन करें।
अंक-4 अंक , मेथी, सलाद, प्याज, हरी सब्जीयां, करेला, नीम, मीठे फल आदि का उपयोग करें।
अंक-5 बादाम, अखरोट और नारियल की गिरि, चुकंदर और जौ की रोटियों का सेवन करना चाहिए।  बादाम और अखरोट ही विशेष रूप से लाभकारी हैं।
अंक-6 अंक 6 वालों के लिए अनार, अंजीर, अखरोट सभी प्रकार की फलियां, चुकंदर, तरबूज, नाशपाती, सेब एवं बादाम

अंक-7 जन्मांक सात वाले लोगों के लिए हर प्रकार के फलों का रस, ककड़ी, प्याज, टमाटर, मूली, नींबू आदि का सलाद, सेब, संतरा, गोभी व अंगूर का सेवन तनाव और चिंता जनित रोगों का निवारण करने में लाभकारी माना गया है।
अंक-8 ताजी हरी सब्जियां और पके फलों का ज्यादा से ज्यादा इस्तेमाल करे तो लंबे समय तक जवान बने रहेंगे।  धनियां, पोदीना, लहसुन, प्याज, पालक की भाजी, गाजर व केला का उपयोग स्वास्थ्य रक्षक होता है।
अंक-9  अदरक, लहसुन, प्याज, लाल एवं हरी मिर्च, कालीमिर्च, तोरई, मीठे फ ल एवं मजीठ का प्रयोग करना लाभ प्रद होता है। गरिष्ठ भोजन, मदिरा का सेवन एवं नशीली वस्तुओं का सेवन करने से इन्हें परहेज